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बीजों पर किसानों का अधिकार, कॉरपोरेट कृषि और आत्मनिर्भर गांवों की चुनौती

विशेष लेख | कृषि, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

भारत में खेती का संकट केवल कम उत्पादन का संकट नहीं है। यह किसानों की आय, खेती की बढ़ती लागत, मिट्टी की सेहत, जल संकट, बीजों पर निर्भरता और ग्रामीण रोजगार का भी संकट है। ऐसे समय में पर्यावरणविद् के विचारों और अफ्रीका में कृषि परिवर्तन के लिए काम करने वाली संस्था की नीतियों के बीच की बहस भारत के लिए विशेष महत्व रखती है।

यह बहस हमें एक बुनियादी सवाल पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है—क्या भारत की कृषि का भविष्य केवल अधिक उत्पादन और आधुनिक तकनीक में है, या किसान की आर्थिक स्वतंत्रता, देशी बीजों, जैव विविधता और स्थानीय खाद्य प्रणालियों को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए?

इसका उत्तर किसी एक विचारधारा को पूरी तरह स्वीकार करने में नहीं, बल्कि भारतीय कृषि की वास्तविक परिस्थितियों को समझने में छिपा है।

1. भारत की हरित क्रांति: उपलब्धियां भी, चुनौतियां भी

1960 के दशक में भारत खाद्यान्न की कमी और आयात पर निर्भरता की चुनौती का सामना कर रहा था। हरित क्रांति के तहत उच्च उपज वाली गेहूं और चावल की किस्मों, सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों तथा कृषि अनुसंधान को बढ़ावा दिया गया।

इसके परिणामस्वरूप भारत के खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई और कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिली।

लेकिन हरित क्रांति का लाभ सभी क्षेत्रों और किसानों तक समान रूप से नहीं पहुंचा। सिंचाई और अन्य सुविधाओं वाले क्षेत्रों को विशेष लाभ मिला। कुछ इलाकों में गेहूं और धान जैसी फसलों पर अत्यधिक निर्भरता, भूजल के दोहन तथा मिट्टी में पोषक तत्वों के असंतुलन जैसी समस्याएं भी सामने आईं।

इस अनुभव से एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है:

उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन उत्पादन बढ़ाने का तरीका ऐसा होना चाहिए जो किसान की आय और प्राकृतिक संसाधनों को भी सुरक्षित रखे।

यहीं से वंदना शिवा के विचार भारतीय कृषि नीति के लिए प्रासंगिक बनते हैं।

2. वंदना शिवा की सोच: किसान केवल उत्पादक नहीं, बीजों का संरक्षक भी है

वंदना शिवा लंबे समय से देशी बीजों के संरक्षण, जैविक खेती और कृषि पर कॉरपोरेट नियंत्रण से जुड़े सवाल उठाती रही हैं। उनकी संस्था नवदान्य किसानों के बीच बीज संरक्षण और जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए काम करती है।

उनकी सोच के तीन प्रमुख आधार हैं।

पहला—बीजों पर किसानों की स्वतंत्रता।

किसान के पास अपनी जरूरत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बीज चुनने के विकल्प होने चाहिए। उसे केवल एक ही प्रकार के बीज या कृषि निवेश पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

दूसरा—जैव विविधता का संरक्षण।

अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी, तापमान, वर्षा और कृषि परंपराओं के अनुकूल फसलों तथा बीजों का संरक्षण भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

तीसरा—खेती की आर्थिक स्वतंत्रता।

यदि किसान की आय का बड़ा हिस्सा बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई और कर्ज की लागत में चला जाता है, तो अधिक उत्पादन के बावजूद उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर रह सकती है।

हालांकि, वंदना शिवा के विचारों के साथ-साथ उनके कुछ व्यापक वैज्ञानिक और कृषि संबंधी दावों की भी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। सभी व्यावसायिक बीज किसानों को एक ही तरह से प्रभावित नहीं करते और जैविक खेती हर परिस्थिति में अधिक उत्पादन या अधिक लाभ की गारंटी नहीं देती।

भारत को विचारों के बजाय प्रमाणों, स्थानीय जरूरतों और किसानों के हितों के आधार पर नीतियां बनानी चाहिए।

3. AGRA की बहस भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

AGRA की स्थापना 2006 में अफ्रीकी देशों में कृषि उत्पादकता, किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा में सुधार के उद्देश्य से की गई थी। इसके कार्यक्रमों में उन्नत बीजों, कृषि निवेश, बाजार और संस्थागत क्षमता को महत्व दिया गया।

आलोचकों का कहना है कि इस तरह के कृषि मॉडल में यदि व्यावसायिक बीजों और बाहरी कृषि निवेश पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ती है, तो छोटे किसानों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

2020 में प्रकाशित False Promises रिपोर्ट ने AGRA के घोषित लक्ष्यों और उपलब्ध परिणामों पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, AGRA अपनी ओर से किसानों की उत्पादकता, बाजार तक पहुंच और कृषि प्रणालियों को मजबूत करने के प्रयासों का समर्थन करता है।

इस बहस से भारत के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न निकलता है:

क्या कृषि विकास की सफलता केवल उत्पादन और बाजार में वृद्धि से मापी जानी चाहिए, या किसान की शुद्ध आय, कर्ज का जोखिम, बीजों की उपलब्धता और मिट्टी की सेहत भी इसके पैमाने होने चाहिए?

भारत को अफ्रीका के अनुभवों से सीखना चाहिए, लेकिन दोनों क्षेत्रों की कृषि परिस्थितियों को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।

भारत के पास अपना कृषि अनुसंधान तंत्र, सार्वजनिक बीज व्यवस्था, सहकारी संस्थाएं और विविध कृषि परंपराएं हैं। इनका उपयोग करते हुए देश अपनी परिस्थितियों के अनुरूप कृषि नीति विकसित कर सकता है।


4. भारत का वास्तविक संकट: किसान की आय और खेती की लागत

भारतीय कृषि पर बहस करते समय एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—अधिक उत्पादन और अधिक आय एक ही बात नहीं हैं।

मान लीजिए, एक किसान पहले 20 क्विंटल फसल पैदा करता था और अब 25 क्विंटल पैदा कर रहा है। पहली नजर में यह सफलता है।

लेकिन यदि बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, मजदूरी और सिंचाई का खर्च भी बढ़ गया तथा फसल का उचित मूल्य नहीं मिला, तो उसकी शुद्ध आय में बहुत कम वृद्धि हो सकती है।

इसलिए कृषि नीति का मूल्यांकन इन सवालों से होना चाहिए:

  • प्रति एकड़ उत्पादन कितना बढ़ा?
  • कुल लागत कितनी बढ़ी?
  • किसान की शुद्ध आय में कितना सुधार हुआ?
  • बाजार में कीमत गिरने पर किसान कितना जोखिम उठाता है?
  • मिट्टी और भूजल पर कितना दबाव पड़ता है?
  • किसान के पास फसल और बीज चुनने के कितने विकल्प हैं?

यह दृष्टिकोण वंदना शिवा की आलोचना से जुड़ा है, लेकिन इसका महत्व किसी एक विचारक तक सीमित नहीं है। किसान की आर्थिक व्यवहार्यता किसी भी कृषि नीति की केंद्रीय कसौटी होनी चाहिए।

5. क्या भारत को देशी बीजों की ओर लौटना चाहिए?

इस प्रश्न का उत्तर केवल हां या नहीं में नहीं दिया जा सकता।

भारत में देशी बीज और पारंपरिक फसलें कृषि जैव विविधता तथा स्थानीय खाद्य परंपराओं के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। दूसरी ओर, आधुनिक कृषि अनुसंधान ने ऐसी किस्में विकसित की हैं जो कुछ परिस्थितियों में अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता या रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करती हैं।

इसलिए उचित नीति का लक्ष्य किसी एक श्रेणी के बीजों को बढ़ावा देकर दूसरे को पूरी तरह खारिज करना नहीं होना चाहिए।

भारत को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें:

  1. देशी और स्थानीय बीजों का संरक्षण हो।
  2. किसानों को गुणवत्तापूर्ण आधुनिक बीज भी उपलब्ध हों।
  3. बीजों की उपज, लागत और रोग प्रतिरोधक क्षमता का वैज्ञानिक परीक्षण हो।
  4. सार्वजनिक कृषि अनुसंधान और बीज उत्पादन को पर्याप्त समर्थन मिले।
  5. किसानों को विभिन्न किस्मों में से चयन करने की स्वतंत्रता मिले।
  6. बीजों की कीमत और उपलब्धता पर नजर रखी जाए।

किसान को एक ही कृषि मॉडल में बांधने के बजाय विकल्प देना अधिक महत्वपूर्ण है।


6. उत्तराखंड के पहाड़: वंदना शिवा के विचारों की एक व्यावहारिक परीक्षा

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह बहस और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहां अनेक गांवों में छोटी जोत, सीढ़ीनुमा खेत, सिंचाई की सीमाएं, जंगली जानवरों से फसल को नुकसान, बाजार तक पहुंच की कठिनाई और खेती से कम आय जैसी चुनौतियां हैं।

इन परिस्थितियों में केवल रासायनिक निवेश बढ़ाकर या उत्पादन के आंकड़े सुधारकर कृषि संकट का समाधान नहीं किया जा सकता।

मंडुवा, झंगोरा और चौलाई का आर्थिक भविष्य

उत्तराखंड की पारंपरिक फसलें केवल खाद्यान्न नहीं हैं। वे स्थानीय कृषि ज्ञान, खाद्य संस्कृति और जैव विविधता का हिस्सा भी हैं।

लेकिन इन फसलों के संरक्षण के लिए केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी।

यदि मंडुवा उगाने वाले किसान को उचित मूल्य नहीं मिलता, तो वह खेती से दूर जा सकता है। यदि झंगोरा का बाजार सीमित है, तो उसका उत्पादन बढ़ाना किसान की आय में पर्याप्त सुधार नहीं करेगा।

इसलिए इन फसलों को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए चार स्तरों पर काम किया जा सकता है:

1. उत्पादन: स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बीज, वैज्ञानिक सलाह और मिट्टी-पानी का संरक्षण।

2. प्रसंस्करण: मंडुवा आटा, पौष्टिक खाद्य पदार्थ और अन्य मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की सुविधाएं।

3. बाजार: स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग, गुणवत्ता मानक, उचित मूल्य और भरोसेमंद खरीद व्यवस्था।

4. रोजगार: गांवों में प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण और विपणन से जुड़े छोटे उद्यम।

यहां वंदना शिवा की जैव विविधता संबंधी सोच को ग्रामीण उद्यमिता के साथ जोड़ने की संभावना दिखाई देती है।

खेती से पलायन रोकने के लिए केवल सब्सिडी पर्याप्त नहीं

उत्तराखंड में कृषि और ग्रामीण विकास की बहस को पलायन से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

यदि खेती से परिवार की आय नहीं चलती, तो युवाओं का रोजगार के लिए बाहर जाना स्वाभाविक है।

इसलिए कृषि नीति का लक्ष्य केवल किसानों को बीज या खाद उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि गांवों में आय के अवसर विकसित करना भी होना चाहिए।

स्थानीय कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण, किसान उत्पादक संगठन, सहकारी विपणन, ग्रामीण पर्यटन और छोटे खाद्य उद्यम एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं।

पहाड़ की खेती तभी टिकेगी, जब उससे जुड़े परिवारों को सम्मानजनक और नियमित आय का रास्ता दिखाई देगा।


7. क्या जैविक खेती भारत की सभी समस्याओं का समाधान है?

वंदना शिवा के विचारों से प्रभावित होकर जैविक खेती को बढ़ावा देना उपयोगी हो सकता है, लेकिन इसे हर परिस्थिति में पूर्ण समाधान मानना सही नहीं होगा।

जैविक खेती से कुछ परिस्थितियों में मिट्टी की गुणवत्ता, जैव विविधता और बाहरी कृषि निवेश पर निर्भरता में सुधार हो सकता है। लेकिन इसके परिणाम फसल, मिट्टी, मौसम, उपलब्ध जैविक खाद और कृषि प्रबंधन पर निर्भर करते हैं।

इसके सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं:

  • संक्रमण अवधि में उत्पादन और आय का जोखिम।
  • पर्याप्त जैविक खाद की उपलब्धता।
  • श्रम की जरूरत और उसकी लागत।
  • जैविक उत्पादों के लिए बाजार तथा प्रमाणन।
  • उपभोक्ताओं को उचित मूल्य मिलने की संभावना।

इसी तरह, रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग भी कई फसलों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए जरूरी हो सकता है।

भारत के लिए अधिक उपयोगी रास्ता ऐसी कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देना है जो मिट्टी की सेहत सुधारें, पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करें, फसल विविधता बनाए रखें और किसानों की आय को ध्यान में रखें।

जहां जैविक खेती व्यावहारिक हो, वहां उसे प्रोत्साहन दिया जाए। जहां अन्य टिकाऊ कृषि पद्धतियां बेहतर परिणाम देती हों, वहां उन्हें भी अपनाया जाए।


8. भारत को किन नीतिगत बदलावों पर विचार करना चाहिए?

वंदना शिवा और AGRA से जुड़ी बहस के आधार पर भारत के लिए कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत प्राथमिकताएं सामने आती हैं।

पहला: किसान की शुद्ध आय को केंद्रीय महत्व

सरकारी योजनाओं के मूल्यांकन में उत्पादन के साथ लागत, शुद्ध आय और बाजार जोखिम को भी शामिल किया जाना चाहिए।

दूसरा: सार्वजनिक कृषि अनुसंधान को मजबूत करना

कृषि विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों को स्थानीय फसलों, जलवायु अनुकूल किस्मों, बीज संरक्षण और कम लागत वाली तकनीकों पर काम करना चाहिए।

तीसरा: स्थानीय बीज व्यवस्था का संरक्षण

सामुदायिक बीज बैंक, बीज विनिमय और पारंपरिक फसलों के संरक्षण को वैज्ञानिक गुणवत्ता परीक्षण के साथ प्रोत्साहित किया जा सकता है।

चौथा: कृषि बाजार में किसानों की स्थिति मजबूत करना

किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों, भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं को मजबूत करके किसानों की बाजार तक पहुंच बढ़ाई जा सकती है।

पांचवां: कृषि नीति में पर्यावरणीय लागत शामिल करना

भूजल, मिट्टी की गुणवत्ता, जैव विविधता और जलवायु जोखिम का आकलन कृषि योजनाओं का हिस्सा होना चाहिए।

छठा: कृषि तकनीक में किसानों की स्वतंत्रता

किसानों को विभिन्न बीजों और कृषि पद्धतियों के लाभ तथा सीमाओं के बारे में विश्वसनीय जानकारी मिले, ताकि वे अपनी परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले सकें।


निष्कर्ष: भारत को किस तरह की कृषि व्यवस्था चाहिए?

वंदना शिवा और AGRA की बहस भारत को एक महत्वपूर्ण संदेश देती है—कृषि विकास को केवल उत्पादन, निवेश या तकनीक के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता।

भारत की हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही, कुछ क्षेत्रों में उससे जुड़ी पर्यावरणीय और कृषि संबंधी चुनौतियों ने अधिक संतुलित नीतियों की आवश्यकता भी सामने रखी।

वंदना शिवा का योगदान इस बात पर जोर देने में है कि बीजों की विविधता, किसानों की स्वतंत्रता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण कृषि नीति के महत्वपूर्ण हिस्से होने चाहिए।

AGRA के अनुभवों पर उठे सवाल यह याद दिलाते हैं कि बड़े कृषि कार्यक्रमों के घोषित उद्देश्यों और वास्तविक परिणामों के बीच अंतर हो सकता है। इसलिए स्वतंत्र मूल्यांकन और पारदर्शिता आवश्यक हैं।

भारत को न तो हर आधुनिक कृषि तकनीक को संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए और न ही हर पारंपरिक पद्धति को बिना वैज्ञानिक परीक्षण के आदर्श मानना चाहिए।

जरूरत ऐसी कृषि व्यवस्था की है जो आधुनिक विज्ञान और स्थानीय ज्ञान, उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण तथा बाजार और किसान अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के लिए यह संतुलन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यहां खेती का भविष्य गांवों की आजीविका और पलायन के प्रश्न से सीधे जुड़ा है।

अंततः सवाल यह नहीं है कि खेती देशी हो या आधुनिक। सवाल यह है कि खेती की व्यवस्था किसान को आर्थिक रूप से सक्षम बनाए, प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखे और अगली पीढ़ी के लिए कृषि के विकल्प खुले रखे।

यही भारत की कृषि नीति के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है।


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By udaen

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