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उत्तराखंड की राजनीति में सरकारें बदलती हैं, मंत्री बदलते हैं, सचिव बदलते हैं, जिलाधिकारी बदलते हैं और विभागों के मुखिया बदलते हैं। लेकिन एक सवाल लगातार अपनी जगह खड़ा है—

क्या शासन की संरचना वास्तव में बदलती है या केवल चेहरे बदलते हैं?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की समस्याएं किसी एक सरकार के कार्यकाल की नहीं हैं। पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पहाड़ों में बुनियादी ढांचे की कमी, अनियोजित शहरीकरण, भूमि विवाद, पर्यावरणीय दबाव और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की कमजोरियां लंबे समय से बनी हुई हैं।

ऐसे में केवल राजनेताओं को दोष देना आसान है। लेकिन केवल नौकरशाही को जिम्मेदार ठहराना भी उतना ही आसान और अधूरा निष्कर्ष है।

असल सवाल है—

राजनीतिक कार्यपालिका और स्थायी नौकरशाही के बीच संबंध किस तरह का है?

क्या दोनों एक-दूसरे को कानून और जनहित की सीमा में रखते हैं?

या कहीं-कहीं ऐसा तंत्र बन जाता है जिसमें राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक सुविधा एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं?

यही वह प्रश्न है जिसकी जांच उत्तराखंड को अब गंभीरता से करनी चाहिए।


नौकरशाही राजनीतिक सरकार के अधीन है, लेकिन कानून के अधीन भी है

मंत्री जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। उन्हें नीतिगत दिशा तय करने का अधिकार है। IAS अधिकारी स्थायी प्रशासन का हिस्सा हैं और उनका दायित्व कानून, नियम और सरकार की वैध नीतियों को लागू करना है।

इस संबंध को “मंत्री मालिक और अधिकारी कर्मचारी” के रूप में देखना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है।

मंत्री को प्रशासनिक सलाह चाहिए।

अधिकारी को राजनीतिक दिशा चाहिए।

लेकिन दोनों के ऊपर संविधान और कानून है।

इसलिए किसी अधिकारी की असली परीक्षा तब होती है जब राजनीतिक निर्देश और कानूनी प्रक्रिया के बीच टकराव पैदा हो।

वहां अधिकारी को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि मंत्री क्या चाहते हैं।

उसे यह भी देखना चाहिए कि कानून क्या कहता है।

और राजनीतिक नेतृत्व को भी यह स्वीकार करना चाहिए कि नौकरशाह का काम हर राजनीतिक निर्देश पर “जी सर” कहना नहीं है।


ट्रांसफर-पोस्टिंग: प्रशासन का सबसे संवेदनशील क्षेत्र

उत्तराखंड में ट्रांसफर और पोस्टिंग लंबे समय से सार्वजनिक बहस का विषय रहे हैं।

2021 में राज्य कार्मिक विभाग के एक आदेश के बारे में रिपोर्ट किया गया था कि IAS अधिकारियों को अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमों का पालन करने और अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर राजनीतिक या अन्य प्रभाव डालकर स्थानांतरण/पोस्टिंग प्रभावित करने का प्रयास न करने की हिदायत दी गई थी।

यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है।

क्योंकि इससे कम-से-कम इतना स्पष्ट होता है कि राज्य में राजनीतिक प्रभाव और पोस्टिंग के संबंध को लेकर प्रशासनिक स्तर पर चिंता व्यक्त की गई थी।

लेकिन समस्या केवल इतनी नहीं है।

यदि अधिकारी राजनीतिक दबाव डालकर अपनी पसंद की पोस्टिंग चाहता है, तो यह भी गलत है।

यदि राजनीतिक नेतृत्व किसी अधिकारी को पसंद या नापसंद के आधार पर पोस्ट करता है, तो यह भी सवाल के घेरे में होना चाहिए।

अर्थात—

समस्या केवल “राजनेता बनाम अधिकारी” नहीं है।

समस्या है—

पोस्टिंग को प्रशासनिक आवश्यकता के बजाय शक्ति और प्रभाव का साधन बना देना।


क्या ट्रांसफर सजा का औजार बन सकता है?

यह प्रश्न केवल उत्तराखंड का नहीं है।

IAS अधिकारियों के राजनीतिक हस्तक्षेप पर हुए शोध में frequent transfers और छोटी tenure को राजनीतिक दबाव के संकेतक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। एक व्यापक अध्ययन में अधिकारियों के औसत कार्यकाल और राजनीतिक बदलावों के साथ transfer patterns के संबंध का विश्लेषण किया गया था।

लेकिन उत्तराखंड के लिए इसका महत्व और अधिक है।

क्योंकि पहाड़ी राज्य में प्रशासनिक निरंतरता बेहद महत्वपूर्ण है।

एक अधिकारी किसी जिले की भौगोलिक, सामाजिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को समझने में महीनों लगाता है।

यदि वह लगातार बदलता रहे तो नई व्यवस्था को फिर से शुरू करना पड़ता है।

फिर सवाल उठता है—

क्या अधिकारी को काम करने का पर्याप्त समय मिला?

और यदि नहीं मिला, तो उसके काम का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया?


कानून मौजूद है, फिर समस्या कहां है?

उत्तराखंड में सार्वजनिक सेवकों के स्थानांतरण से संबंधित 2017 का कानून है। हाल के एक मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक वन अधिकारी के स्थानांतरण पर रोक लगाते हुए अनिवार्य वैधानिक प्रक्रिया के पालन पर जोर दिया था। रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने माना कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया premature transfer कानूनी आधार से रहित था।

यह उदाहरण एक महत्वपूर्ण बात बताता है—

नियम होने और नियम लागू होने में अंतर है।

कानून बना देना पर्याप्त नहीं है।

जरूरी यह है कि उसका पालन कौन कराएगा?

यदि किसी अधिकारी का निर्धारित कार्यकाल पूरा होने से पहले तबादला होता है तो उसके कारण स्पष्ट होने चाहिए।

यदि यह प्रशासनिक आवश्यकता है तो उसका रिकॉर्ड होना चाहिए।

यदि अपवाद का इस्तेमाल हुआ है तो उसकी भी वजह होनी चाहिए।

और यदि नियम का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।


ACR: अधिकारी की स्वतंत्रता का दूसरा प्रश्न

अब आते हैं ACR/APAR पर।

किसी अधिकारी के करियर में performance assessment का महत्व बहुत अधिक है।

यहीं से एक बुनियादी संस्थागत प्रश्न पैदा होता है—

क्या अधिकारी स्वतंत्र होकर अपने वरिष्ठ या राजनीतिक नेतृत्व से असहमति दर्ज कर सकता है?

यदि कोई अधिकारी यह सोचने लगे कि—

“मैंने गलत निर्णय का विरोध किया तो मेरी ACR खराब हो सकती है।”

“मैंने मंत्री के निर्देश पर सवाल उठाया तो मेरा तबादला हो सकता है।”

“मैंने किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की तो मेरा पद बदल सकता है।”

तो फिर प्रशासनिक स्वतंत्रता कागज पर रह जाती है।

लेकिन यहां भी एक बात स्पष्ट होनी चाहिए।

ACR को राजनीतिक प्रतिशोध का औजार कहना तभी उचित होगा जब उसके समर्थन में दस्तावेजी प्रमाण हों।

पत्रकारिता का काम यह कहना नहीं है कि “हर अधिकारी डरता है।”

पत्रकारिता का काम यह पूछना है—

क्या ऐसी संस्थागत सुरक्षा पर्याप्त है कि अधिकारी बिना भय के वैधानिक आपत्ति दर्ज कर सके?


राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक सुविधा: सबसे खतरनाक संयोजन

भ्रष्टाचार के बड़े मामलों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है—

एक व्यक्ति अकेले बड़ी प्रशासनिक अनियमितता नहीं कर सकता।

सरकारी जमीन, बड़े ठेके, खनन, निर्माण, खरीद, भर्ती, परियोजनाएं और भुगतान—इनमें कई स्तरों की प्रक्रिया होती है।

इसलिए यदि कहीं गंभीर अनियमितता सामने आती है तो जांच केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं होनी चाहिए जिसने अंतिम दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया।

पूरी decision chain देखनी चाहिए।

किसने प्रस्ताव बनाया?

किसने technical approval दिया?

किसने वित्तीय अनुमति दी?

किसने tender प्रक्रिया देखी?

किसने contract दिया?

किसने काम की गुणवत्ता प्रमाणित की?

किसने payment जारी किया?

और audit objection आने के बाद किसने कार्रवाई की?

यही वह जगह है जहां राजनीति और नौकरशाही की वास्तविक जवाबदेही सामने आती है।


विधानसभा सचिवालय का मामला: एक चेतावनी

2026 में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय में 2016 से 2022 के बीच 227 ad hoc नियुक्तियों के संबंध में जांच हुई और बाद में नियुक्तियां समाप्त की गईं। रिपोर्ट में file notings के आधार पर यह आरोप लगाया गया कि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने अपने अधिकारियों की सलाह और नियमों से जुड़े red flags के बावजूद नियुक्तियों को मंजूरी दी।

यह मामला किसी एक पार्टी की बहस तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

क्योंकि रिपोर्ट में अलग-अलग राजनीतिक कार्यकालों का उल्लेख है।

यह मामला एक बड़ा सवाल उठाता है—

यदि अधिकारी फाइल पर आपत्ति लिखता है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व निर्णय लेता है, तो बाद में जवाबदेही किसकी होगी?

और दूसरा सवाल—

यदि अधिकारी को नियमों की समस्या दिखाई देती है लेकिन वह उसे रोक नहीं पाता, तो संस्थागत सुरक्षा कहां है?

यही कारण है कि केवल “नेता भ्रष्ट है” या “अधिकारी भ्रष्ट है” कहना समस्या को छोटा कर देता है।

हमें देखना होगा कि decision-making architecture कैसे काम कर रहा है।


जब मंत्री और IAS आमने-सामने आए

2022 में उत्तराखंड में तत्कालीन खाद्य मंत्री रेखा आर्य और IAS अधिकारी सचिन कुर्वे के बीच transfer orders को लेकर सार्वजनिक विवाद सामने आया था। मंत्री ने अधिकारी पर नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया, जबकि अधिकारी ने Uttarakhand Annual Transfer for Public Servants Act, 2017 के अनुरूप कार्रवाई करने की बात कही। मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचा था।

यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक बुनियादी लोकतांत्रिक टकराव दिखाई देता है—

राजनीतिक अधिकार बनाम प्रशासनिक प्रक्रिया।

ऐसे मामलों में जीत किसकी होती है, यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—

क्या निर्णय कानून के अनुसार हुआ?

यही कसौटी होनी चाहिए।


नौकरशाही भी निर्दोष नहीं है

यह संपादकीय केवल राजनीतिक नेतृत्व को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं है।

IAS या किसी भी सरकारी सेवा में होना भ्रष्टाचार से immunity नहीं देता।

यदि कोई अधिकारी पद का दुरुपयोग करता है, गलत निर्णय लेता है, निजी लाभ देता है, नियमों की अनदेखी करता है या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुंचाता है, तो उसकी जवाबदेही उतनी ही आवश्यक है।

लेकिन भ्रष्ट अधिकारी को पकड़ने का मतलब यह नहीं कि पूरी नौकरशाही को भ्रष्ट घोषित कर दिया जाए।

उत्तराखंड में हजारों अधिकारी और कर्मचारी ईमानदारी से काम करते हैं।

समस्या व्यक्तियों की संख्या से अधिक institutional incentives की है।


राजनीति भी निर्दोष नहीं है

दूसरी तरफ राजनीतिक नेतृत्व को भी यह स्वीकार करना होगा कि निर्वाचित होना कानून से ऊपर होने का प्रमाण नहीं है।

मंत्री का आदेश प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

लेकिन यदि आदेश कानून के विरुद्ध है तो उसे चुनौती देने की व्यवस्था होनी चाहिए।

राजनीतिक नेतृत्व यदि अधिकारियों को केवल अपनी पसंद के अनुसार नियुक्त और हटाने लगे तो धीरे-धीरे प्रशासनिक तंत्र professional civil service से political service में बदलने का खतरा पैदा करता है।

और यही लोकतंत्र की बड़ी विडंबना होगी।


उत्तराखंड में असली सुधार क्या होना चाहिए?

सवाल केवल भ्रष्टाचार पकड़ने का नहीं है।

सवाल भ्रष्टाचार के लिए अनुकूल वातावरण कम करने का है।

पहला—Transfer Posting Commission को वास्तविक स्वतंत्रता

स्थानांतरण और पोस्टिंग में स्पष्ट नियम होने चाहिए।

किसी अधिकारी का premature transfer हो तो कारण दर्ज हो।

अपवादों की समीक्षा हो।

और आदेश सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हो।

दूसरा—लिखित निर्देश की संस्कृति

मौखिक आदेशों को प्रशासनिक निर्णय का आधार नहीं बनना चाहिए।

यदि राजनीतिक नेतृत्व किसी महत्वपूर्ण विषय पर निर्देश देता है तो उसे लिखित रिकॉर्ड में होना चाहिए।

इससे मंत्री भी सुरक्षित रहेगा और अधिकारी भी।

तीसरा—ACR/APAR में संस्थागत सुरक्षा

यदि अधिकारी ने किसी निर्णय पर लिखित कानूनी आपत्ति दर्ज की है तो केवल उस असहमति को उसके performance assessment में नकारात्मक रूप से इस्तेमाल न किया जा सके।

चौथा—Decision Audit

हर बड़ी परियोजना के लिए केवल financial audit पर्याप्त नहीं है।

यह भी देखा जाना चाहिए कि निर्णय किस आधार पर लिया गया।

किस विकल्प को क्यों चुना गया।

किसकी सलाह मानी गई।

किसकी आपत्ति खारिज हुई।

पांचवां—Public Dashboard

बड़े सरकारी ठेकों, परियोजनाओं, लागत, contractor, समय सीमा, भुगतान और completion status को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

छठा—विभागीय जांच की समय सीमा

जांच वर्षों तक लंबित रहना स्वयं accountability failure है।

सातवां—Whistleblower Protection

जो अधिकारी या कर्मचारी गलत निर्णय की सूचना देता है, उसे ही प्रताड़ित कर दिया गया तो कोई व्यक्ति आगे नहीं आएगा।


मीडिया को भी अपनी भूमिका बदलनी होगी

पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब पत्रकार सत्ता के साथ संबंध को खबर से ऊपर रख देता है।

किसी सरकार की प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित करना पत्रकारिता नहीं है।

किसी विपक्षी नेता का आरोप प्रकाशित करना भी पूरी पत्रकारिता नहीं है।

असली पत्रकारिता वहां शुरू होती है जहां पत्रकार पूछता है—

दस्तावेज कहां हैं?

किसने हस्ताक्षर किए?

फाइल में क्या लिखा है?

सरकार ने किस नियम के तहत निर्णय लिया?

CAG ने क्या कहा?

विधानसभा में क्या जवाब दिया गया?

RTI से क्या सामने आया?

जांच एजेंसी ने क्या पाया?

और अदालत ने क्या कहा?

यही वह प्रक्रिया है जो आरोप को जांच में बदलती है।


उत्तराखंड को “कौन दोषी है?” से आगे बढ़ना होगा

यह कहना कि “सारा भ्रष्टाचार नेताओं ने किया” तथ्यात्मक रूप से उतना ही कमजोर है जितना यह कहना कि “सारा भ्रष्टाचार IAS ने किया।”

सच्चाई कई बार इससे अधिक जटिल होती है।

कहीं राजनीतिक हस्तक्षेप हो सकता है।

कहीं प्रशासनिक भ्रष्टाचार।

कहीं ठेकेदार–अधिकारी गठजोड़।

कहीं राजनीतिक संरक्षण।

कहीं विभागीय लापरवाही।

और कहीं केवल खराब प्रशासनिक क्षमता।

इसलिए हर मामले की अलग जांच जरूरी है।

लेकिन एक बात निर्विवाद है—

जहां राजनीतिक शक्ति और प्रशासनिक शक्ति दोनों जवाबदेही से बचने लगें, वहां जनता सबसे कमजोर पक्ष बन जाती है।


उत्तराखंड का भविष्य इस सवाल पर निर्भर है

क्या हम ऐसा प्रशासन बना सकते हैं जिसमें मंत्री को यह डर न हो कि अधिकारी उसकी नीति को रोक देगा, लेकिन अधिकारी को भी यह डर न हो कि कानून की बात करने पर उसका तबादला कर दिया जाएगा?

क्या हम ऐसा सिस्टम बना सकते हैं जहां ईमानदार अधिकारी को राजनीतिक संरक्षण की आवश्यकता न पड़े?

क्या हम ऐसा तंत्र बना सकते हैं जहां भ्रष्ट अधिकारी को किसी राजनीतिक संरक्षण की आवश्यकता न हो—क्योंकि संरक्षण मिलने की संभावना ही समाप्त हो?

क्या हम ऐसा शासन बना सकते हैं जहां किसी परियोजना में हजारों करोड़ रुपये खर्च होने से पहले जनता को पता हो कि पैसा कहां जा रहा है?

और क्या हम ऐसा उत्तराखंड बना सकते हैं जहां पद पुरस्कार नहीं बल्कि जिम्मेदारी हो?


निष्कर्ष: असली लड़ाई व्यक्ति बनाम व्यक्ति नहीं है

उत्तराखंड को “IAS बनाम मंत्री” की लड़ाई से बाहर निकलना होगा।

मंत्री और अधिकारी दोनों आवश्यक हैं।

लेकिन दोनों से ऊपर संविधान, कानून और जनता हैं।

राजनीतिक नेतृत्व को जवाबदेह बनाना होगा।

नौकरशाही को भी जवाबदेह बनाना होगा।

विधानसभा को अधिक प्रभावी निगरानी करनी होगी।

जांच संस्थाओं को स्वतंत्र और समयबद्ध तरीके से काम करना होगा।

और मीडिया को सत्ता के किसी भी पक्ष का प्रवक्ता बनने से बचना होगा।

क्योंकि यदि किसी अधिकारी का करियर राजनीतिक पसंद से तय होगा तो प्रशासन कमजोर होगा।

यदि किसी मंत्री का निर्णय नौकरशाही की मनमर्जी से नियंत्रित होगा तो लोकतांत्रिक जनादेश कमजोर होगा।

और यदि दोनों मिलकर जनता की जवाबदेही से बचेंगे तो लोकतंत्र कमजोर होगा।

इसलिए उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि—

“कौन भ्रष्ट है?”

सबसे बड़ा प्रश्न यह है—

“हमने ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जिसमें भ्रष्ट होना, गलत आदेश देना और गलत आदेश मानना—तीनों कठिन हो जाएं?”

यही उत्तराखंड की असली प्रशासनिक लड़ाई है।

और इस लड़ाई में किसी पार्टी की जीत नहीं होनी चाहिए।

जीत जनता की होनी चाहिए।

क्योंकि अंततः सरकार का खजाना जनता का है, सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है, प्रशासन जनता के लिए है और सत्ता का अंतिम स्रोत भी जनता ही है।

जिस दिन उत्तराखंड की शासन-व्यवस्था में यह बात व्यवहार में उतरेगी, उस दिन राजनीतिक संरक्षण और नौकरशाही की मजबूरी—दोनों की शक्ति सीमित हो जाएगी।

और शायद उसी दिन राज्य में “सुशासन” नारा नहीं, वास्तविकता बनना शुरू होगा।


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By udaen

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