सुंदर चंद ठाकुर की विदाई पत्रकारिता की उस परंपरा की याद दिलाती है, जिसमें पेशा केवल नौकरी नहीं, जीवन को समझने का माध्यम था

पत्रकारिता को अगर केवल रोज खबर लिखने, डेडलाइन पूरी करने और अखबार निकालने का पेशा समझ लिया जाए तो शायद हम इसके वास्तविक अर्थ को बहुत छोटा कर देंगे। पत्रकारिता दरअसल जीवन और समाज को समझने की एक सतत प्रक्रिया है। यहां एक व्यक्ति अपने भीतर कई संसारों को जगह दे सकता है—रिपोर्टर, संपादक, लेखक, विचारक, सामाजिक पर्यवेक्षक और कभी-कभी शिक्षक भी।
इसीलिए पत्रकारिता को अद्भुत क्षेत्र कहा जाता है। यहां प्रयोग करने के लिए एक उम्र भी कम पड़ सकती है।
लेकिन आज इसी पत्रकारिता के सामने एक विडंबना भी खड़ी है। सूचना की बाढ़ है, लेकिन विश्वसनीय सूचना का संकट है। पत्रकारों की संख्या बढ़ी है, लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों को लेकर चिंता भी बढ़ी है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन बिना सत्यापन की सामग्री ने भ्रम और अफवाहों के लिए भी अभूतपूर्व जगह पैदा कर दी है।
ऐसे समय में किसी पत्रकार की उपलब्धि केवल उसके पद से नहीं, बल्कि उसके पूरे पेशेवर जीवन से आंकी जानी चाहिए।
सुंदर चंद ठाकुर की यात्रा इसी कसौटी पर उल्लेखनीय दिखाई देती है।
भारतीय सेना में कैप्टन के रूप में सेवा से शुरुआत करने वाला व्यक्ति बाद में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से जुड़ता है और फिर उसी समूह के हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स के संपादकीय नेतृत्व तक पहुंचता है। यह यात्रा अपने आप में बताती है कि पत्रकारिता की दुनिया में अनुभव की कोई एक निर्धारित पाठशाला नहीं होती।
सेना ने अनुशासन दिया होगा, कॉर्पोरेट संस्थान ने प्रबंधन की समझ दी होगी और पत्रकारिता ने सवाल पूछने की दृष्टि। साहित्य ने संवेदना को विस्तार दिया और फिटनेस ने निरंतरता और आत्मानुशासन को।
एक पत्रकार के लिए ये सभी गुण महत्वपूर्ण हैं।
क्योंकि पत्रकारिता केवल तथ्यों को इकट्ठा करने का काम नहीं है। तथ्यों को संदर्भ में रखना भी पत्रकारिता है।
एक सरकारी योजना की घोषणा खबर है, लेकिन यह पता लगाना कि उसका लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा या नहीं—यह पत्रकारिता है।
सरकार का बयान खबर है, लेकिन उसके दावे की स्वतंत्र पुष्टि करना—यह पत्रकारिता है।
किसी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होना खबर हो सकता है, लेकिन उसकी तारीख, स्थान और वास्तविकता की जांच किए बिना उसे प्रकाशित न करना—यह पत्रकारिता की जिम्मेदारी है।
यही जिम्मेदारी आज सबसे अधिक चुनौती में है।
एआई के दौर में पत्रकार की असली परीक्षा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर ने पत्रकारिता के सामने नई संभावनाएं भी खोली हैं और नए खतरे भी।
आज कुछ सेकंड में टेक्स्ट तैयार हो सकता है। तस्वीरें बनाई जा सकती हैं। वीडियो तैयार किए जा सकते हैं। आवाज की नकल की जा सकती है। लेकिन किसी सूचना के सत्य होने की गारंटी तकनीक नहीं दे सकती।
इसलिए भविष्य की पत्रकारिता में सबसे मूल्यवान चीज शायद गति नहीं, विश्वसनीयता होगी।
मशीन सामग्री तैयार कर सकती है, लेकिन जमीन पर जाकर किसी प्रभावित व्यक्ति की आंखों में देखकर सवाल पूछना अभी भी पत्रकार का काम है।
यही कारण है कि अनुभवी पत्रकारों का महत्व आने वाले समय में कम नहीं होगा।
पत्रकारिता में ‘कचरा’ बढ़ने का अर्थ क्या है?
आज पत्रकारिता की आलोचना करते हुए अक्सर कहा जाता है कि इसमें ‘कचरा’ बहुत बढ़ गया है। यह टिप्पणी कठोर जरूर है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर चिंता छिपी है।
जब पत्रकारिता का मूल्यांकन केवल व्यूज, क्लिक, टीआरपी और वायरलिटी से होने लगे तो सामाजिक सरोकार पीछे छूटने लगते हैं।
जब पत्रकार की सफलता उसकी पहुंच से तय होने लगे और उसकी विश्वसनीयता गौण हो जाए, तब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका कमजोर होती है।
जब पत्रकार सत्ता से कठिन सवाल पूछने के बजाय सत्ता के बयान को ही खबर समझने लगे, तब पत्रकारिता का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
आज भी देश में ऐसे पत्रकार हैं जो सीमित संसाधनों के बावजूद तथ्य जुटाते हैं, आरटीआई लगाते हैं, अदालतों के दस्तावेज पढ़ते हैं, गांवों तक जाते हैं और उन लोगों की आवाज सामने लाते हैं जिनके पास अपनी बात कहने का मंच नहीं है।
यही लोग पत्रकारिता की उम्मीद हैं।
सुंदर चंद ठाकुर का महत्व इसी संदर्भ में
सुंदर चंद ठाकुर को केवल एक सेवानिवृत्त संपादक के रूप में देखना उनके पेशेवर जीवन को छोटा कर देना होगा।
उनकी पहचान साहित्य और फिटनेस जैसे क्षेत्रों से भी जुड़ी रही है। एक ओर संपादकीय जिम्मेदारी और दूसरी ओर लेखन तथा शारीरिक-मानसिक फिटनेस के प्रति प्रतिबद्धता—यह संयोजन पत्रकारिता के उस व्यापक चरित्र की याद दिलाता है जिसमें पत्रकार का व्यक्तित्व न्यूज़रूम से बाहर भी विकसित होता है।
उनकी सेवानिवृत्ति के अवसर पर नवभारत टाइम्स, मुंबई द्वारा विशेष पृष्ठ प्रकाशित किया जाना भी इसी पेशेवर यात्रा के सम्मान के रूप में देखा जा सकता है।
लेकिन असली सम्मान अखबार के पन्नों से कहीं बड़ा है।
असली सम्मान यह है कि किसी व्यक्ति की विदाई के बाद भी उसके काम को याद किया जाए।
रिटायरमेंट के बाद भी पत्रकारिता जारी रहती है
पत्रकार का पद समाप्त हो सकता है, लेकिन उसका अनुभव नहीं।
दरअसल वरिष्ठ पत्रकारों की सबसे बड़ी भूमिका उनकी अगली पारी में सामने आ सकती है। वे नई पीढ़ी को बता सकते हैं कि खबर और प्रचार में अंतर क्या है, स्रोत की विश्वसनीयता कैसे जांची जाती है, सत्ता से सवाल कैसे पूछे जाते हैं और अपनी गलती स्वीकार करना पत्रकारिता की कमजोरी नहीं बल्कि ताकत क्यों है।
आज पत्रकारिता संस्थानों को ऐसे वरिष्ठ लोगों की आवश्यकता है जो नई पीढ़ी के पत्रकारों को केवल तकनीक नहीं, पत्रकारिता का विवेक भी सिखा सकें।
किस तरह की पत्रकारिता चाहिए?
यह सवाल अब हर पत्रकार और हर मीडिया संस्थान के सामने है।
क्या हमें केवल तेज पत्रकारिता चाहिए?
या विश्वसनीय पत्रकारिता?
क्या हमें वायरल खबर चाहिए?
या ऐसी खबर जो पांच साल बाद भी संदर्भित की जा सके?
क्या हमें सत्ता के करीब रहने वाला पत्रकार चाहिए?
या समाज के करीब रहने वाला?
इन सवालों का उत्तर ही पत्रकारिता के भविष्य को तय करेगा।
सुंदर चंद ठाकुर की पेशेवर यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण बात याद दिलाती है—पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए केवल पत्रकार होना पर्याप्त नहीं है; जिज्ञासु, संवेदनशील, अनुशासित और स्वतंत्र होना भी जरूरी है।
और शायद यही कारण है कि कुछ लोग पद से हटने के बाद भी अपने पेशे में मौजूद रहते हैं।
वे किसी कुर्सी पर नहीं होते, लेकिन उनकी कार्यशैली, उनके विचार और उनके अनुभव नई पीढ़ी के लिए संदर्भ बन जाते हैं।
पत्रकारिता में भीड़ हमेशा रहेगी। शोर भी रहेगा। ‘कचरा’ भी रहेगा।
लेकिन जब तक कुछ लोग तथ्य के साथ खड़े रहेंगे, सवाल पूछते रहेंगे और अपने पेशे को ईमानदारी से जीते रहेंगे, तब तक पत्रकारिता की उम्मीद भी बनी रहेगी।
सुंदर चंद ठाकुर की यात्रा इसी उम्मीद की एक मिसाल है।
क्योंकि संपादक की पहचान उसकी कुर्सी से नहीं होती।
उसकी पहचान इस बात से होती है कि उसके जाने के बाद पत्रकारिता में क्या बचा रह गया।
