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विशेष जमीनी पड़ताल

उत्तराखंड में छोटे अखबारों पर दोहरी मार: पंजीकरण का संकट, डाक खर्च की चिंता और सरकारी विज्ञापनों का सवाल

कोटद्वार/देहरादून। देशभर में 80 हजार से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के पंजीकरण रद्द होने और डाक नियमों में बदलाव की खबर ने उत्तराखंड के छोटे एवं स्वतंत्र समाचार पत्रों के सामने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर पर्वतीय जिलों में प्रकाशित होने वाले मासिक समाचार पत्रों और लघु पत्रिकाओं के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है।

उत्तराखंड में पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा छोटे प्रकाशनों और सीमित संसाधनों वाले पत्रकारों के सहारे संचालित होता है। ये प्रकाशन उन गांवों और कस्बों की समस्याओं को सामने लाते हैं, जहां बड़े मीडिया संस्थानों की नियमित पहुंच नहीं होती।

लेकिन सवाल यह है कि क्या मौजूदा नियम और आर्थिक व्यवस्था छोटे प्रकाशनों के लिए अनुकूल हैं? क्या सरकार फर्जी और निष्क्रिय प्रकाशनों पर कार्रवाई के साथ वास्तविक रूप से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों को बचाने की व्यवस्था भी कर रही है?

सरकारी आंकड़ों में उत्तराखंड की स्थिति

केंद्र सरकार ने 11 मार्च 2026 को लोकसभा में प्रेस सेवा पोर्टल से संबंधित जानकारी देते हुए राज्यवार आंकड़े जारी किए थे।

1,096

उत्तराखंड में रद्द किए गए प्रकाशनों के पंजीकरण

88,315

देशभर में कुल रद्द पंजीकरण

₹8.68 लाख

उत्तराखंड से प्राप्त जुर्माना राशि

स्रोत: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का लोकसभा में प्रस्तुत जवाब। Press Information Bureau +1

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। पंजीकरण रद्द होने का अर्थ यह नहीं है कि इतने ही समाचार पत्र वास्तव में छपना बंद हो गए। सरकारी आंकड़ा पंजीकरण रद्द होने का है, न कि बंद हुए प्रकाशनों की प्रमाणित संख्या का।

डाक नियमों में आखिर बदलाव क्या है?

डाक विभाग के आधिकारिक नियमों में प्रकाशनों के लिए अलग-अलग श्रेणियां निर्धारित हैं।

  • Periodical Post: प्रेस एवं आवधिक प्रकाशन अधिनियम के तहत पंजीकृत और निर्धारित शर्तें पूरी करने वाले प्रकाशन इस श्रेणी में डाक से भेजे जा सकते हैं।
  • Registered Newspaper: समाचार पत्र की परिभाषा में दैनिक या कम से कम सप्ताह में एक बार प्रकाशित होने वाला समाचार पत्र शामिल है। रियायती डाक सुविधा के लिए अलग डाक पंजीकरण या लाइसेंस की शर्त लागू होती है।
  • Magazine Post: इसके लिए कम से कम 500 वास्तविक ग्राहकों की सूची और एक बार में कम से कम 500 प्रतियां भेजने की शर्त है।

इसलिए मासिक और त्रैमासिक पत्रिकाओं के लिए डाक व्यवस्था का प्रभाव समझने के लिए इन अलग-अलग श्रेणियों और उनकी दरों का अध्ययन जरूरी है। India Post +2

सरकार और विभागों से जवाब मांगते ये सवाल

इस मामले में वास्तविक स्थिति जानने के लिए निम्न सवाल प्रेस रजिस्ट्रार जनरल, डाक विभाग और उत्तराखंड सूचना विभाग के सामने रखे जाने चाहिए।

विभागप्रमुख सवाल
प्रेस रजिस्ट्रार जनरलउत्तराखंड में 1,096 पंजीकरण किन कारणों से रद्द किए गए?
प्रेस रजिस्ट्रार जनरलकितने प्रकाशकों को नोटिस और सुनवाई का अवसर दिया गया?
डाक विभागमासिक और त्रैमासिक पत्रिकाओं को रियायती डाक सुविधा किस दर पर मिलेगी?
डाक विभाग2027 से पुराने पोस्टल लाइसेंस की व्यवस्था का क्या होगा?
सूचना विभाग, उत्तराखंडलघु एवं मासिक समाचार पत्रों के लिए विज्ञापन नीति में क्या प्रावधान हैं?
सूचना विभाग, उत्तराखंडक्या छोटे प्रकाशनों के लिए विशेष सहायता या प्रशिक्षण की व्यवस्था है?

स्थानीय पत्रकारों और प्रकाशकों के सामने रखने योग्य सवाल

इस रिपोर्ट को वास्तविक जमीनी पड़ताल बनाने के लिए कोटद्वार, पौड़ी, देहरादून, टिहरी, चमोली और उत्तरकाशी के प्रकाशकों से ये जानकारियां जुटाई जानी चाहिए।

  • क्या पिछले एक साल में आपके समाचार पत्र का पंजीकरण या नवीनीकरण प्रभावित हुआ?
  • क्या प्रेस सेवा पोर्टल पर वार्षिक विवरण जमा करने में तकनीकी परेशानी आई?
  • एक अंक की छपाई और डाक से वितरण पर कितना खर्च आता है?
  • क्या सरकारी विज्ञापनों से प्रकाशन का खर्च निकल पाता है?
  • क्या डाक खर्च बढ़ने पर आप ग्राहकों की संख्या या प्रकाशन की आवृत्ति घटाने को मजबूर होंगे?

नोट: अभी किसी स्थानीय पत्रकार का साक्षात्कार या बयान उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी के नाम से काल्पनिक बयान शामिल नहीं किए गए हैं।

सरकार का पक्ष भी जरूरी

सरकार की ओर से इस व्यवस्था के पक्ष में यह तर्क सामने आया है कि प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से पुराने रिकॉर्ड को डिजिटल किया गया है, पंजीकरण प्रक्रिया ऑनलाइन हुई है और 780 जिलों के निर्धारित अधिकारियों को पोर्टल से जोड़ा गया है। 1 मार्च 2024 से 11,081 आवेदन संसाधित किए जाने की जानकारी भी लोकसभा में दी गई है। Press Information Bureau

वहीं, डाक विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर Periodical Post की सुविधा का प्रावधान भी मौजूद है। इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि मासिक और त्रैमासिक प्रकाशनों को कौन-सी डाक श्रेणी और किस दर का लाभ मिलेगा। India Post

रिपोर्ट का निष्कर्ष

छोटे समाचार पत्रों की समस्याओं को केवल व्यावसायिक नुकसान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। स्थानीय पत्रकारिता लोकतंत्र में सूचना के विकेंद्रीकरण का माध्यम है।

बड़े मीडिया संस्थानों के पास संसाधन, विज्ञापन और वितरण की बेहतर व्यवस्था हो सकती है, लेकिन छोटे प्रकाशन सीमित साधनों में उन मुद्दों को उठाते हैं जो अक्सर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाते।

सरकार को फर्जी और निष्क्रिय प्रकाशनों के विरुद्ध कार्रवाई करने का अधिकार है, लेकिन वास्तविक रूप से प्रकाशित होने वाले छोटे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए तकनीकी सहायता, सरल अनुपालन, उचित डाक दर और पारदर्शी विज्ञापन नीति भी सुनिश्चित करनी चाहिए।

क्योंकि किसी छोटे अखबार का बंद होना केवल एक प्रकाशन का बंद होना नहीं, बल्कि किसी क्षेत्र की एक आवाज का कमजोर पड़ना भी हो सकता है।

प्रकाशन के लिए महत्वपूर्ण मूल स्रोत


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By udaen

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