खेत संकट में हैं, और सत्ता उत्सव में
भारत का कृषि संकट अब किसी एक मौसम, एक फसल या एक राज्य तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक बहुस्तरीय राष्ट्रीय आपदा का रूप ले चुका है—जहाँ बिगड़ता मानसून, पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतें, खाद संकट और किसानों को उपज का उचित मूल्य न मिलना, सब मिलकर ग्रामीण भारत की रीढ़ तोड़ रहे हैं।
देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, लेकिन विडंबना यह है कि सबसे अधिक उपेक्षित भी वही वर्ग है जो देश को भोजन देता है।
इस वर्ष मानसून का असंतुलन केवल मौसम विज्ञान की खबर नहीं है। यह खेतों की लागत, उत्पादन और भविष्य—तीनों को प्रभावित कर रहा है। कहीं अत्यधिक बारिश फसलें डुबो रही है, तो कहीं सूखे जैसी स्थिति बन रही है। जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की कठोर सच्चाई बन चुका है। लेकिन भारत की कृषि नीतियाँ अब भी 20वीं सदी की सोच पर टिकी दिखाई देती हैं।
दूसरी तरफ पेट्रोल और डीज़ल की लगातार ऊँची कीमतों ने खेती की लागत को विस्फोटक स्तर तक पहुँचा दिया है। ट्रैक्टर चलाने से लेकर सिंचाई और मंडी तक फसल पहुँचाने तक हर प्रक्रिया महंगी हो चुकी है। किसान केवल खेत में फसल नहीं उगाता, वह ईंधन आधारित अर्थव्यवस्था का पूरा बोझ भी ढो रहा है।
खाद संकट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। यूरिया और डीएपी की किल्लत केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नीति और वितरण तंत्र की गहरी कमजोरी को उजागर करती है। कई राज्यों में किसान घंटों लाइन में लगने को मजबूर हैं। कुछ जगहों पर कालाबाज़ारी की शिकायतें हैं। सरकारें घोषणाएँ कर रही हैं, लेकिन ज़मीन पर किसान को समय पर खाद नहीं मिल पा रही।
सबसे दुखद स्थिति तब बनती है जब किसान इतनी कठिन परिस्थितियों में फसल तैयार करने के बाद भी अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं पा रहा। मंडियों में लागत से कम दाम, बिचौलियों का दबाव और समर्थन मूल्य की सीमित पहुँच ने किसान को आर्थिक रूप से असुरक्षित बना दिया है। एक तरफ कॉरपोरेट मुनाफे रिकॉर्ड बना रहे हैं, दूसरी तरफ किसान अपनी लागत निकालने के लिए संघर्ष कर रहा है।
यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असंतुलन भी है। चुनावों में किसानों के नाम पर राजनीति होती है, लेकिन नीतियों में किसान अक्सर आखिरी पंक्ति में खड़ा दिखाई देता है। कृषि सुधारों की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन खेती को लाभकारी बनाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति कम दिखाई देती है।
भारत की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जो वर्ग देश को भूखा नहीं मरने देता, वही वर्ग सबसे अधिक असुरक्षित है। किसान आज केवल मौसम से नहीं लड़ रहा, वह बाजार, नीति, महंगाई और प्रशासनिक उदासीनता—सबसे एक साथ लड़ रहा है।
यदि यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में कृषि संकट केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार, पलायन और सामाजिक स्थिरता तक दिखाई देगा।
देश को यह तय करना होगा कि वह कृषि को केवल चुनावी भाषण का विषय बनाए रखना चाहता है या वास्तव में किसानों को आर्थिक सम्मान देना चाहता है। क्योंकि खेत केवल अन्न नहीं उगाते—वे राष्ट्र का भविष्य भी उगाते हैं।
