बंधुआ मजदूरी पर कानून बना, लेकिन क्या व्यवस्था बदली?
25 अक्टूबर 1975 को भारत ने एक ऐतिहासिक घोषणा की—देश में बंधुआ मजदूरी प्रणाली समाप्त की जाएगी। इसके बाद 1976 में लागू किया गया, जिसने इस अमानवीय प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया।
यह केवल एक कानून नहीं था, बल्कि उस सामाजिक ढांचे को चुनौती थी जिसमें गरीबी, जाति, कर्ज और सामंती ताकतें मिलकर इंसानों को पीढ़ियों तक गुलामी में जकड़े रखती थीं।
लेकिन सवाल आज भी खड़ा है—क्या बंधुआ मजदूरी सचमुच खत्म हुई?
आज भी ईंट-भट्टों, खदानों, खेतों, कारखानों और घरेलू कामों में लाखों श्रमिक कर्ज, भय और मजबूरी के जाल में फंसे हुए दिखाई देते हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि अब “बंधुआ मजदूरी” कई बार ठेकेदारी, माइग्रेशन, एडवांस पेमेंट और असंगठित श्रम के नए रूपों में छिप जाती है।
उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी पलायन, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता ने श्रमिकों को असुरक्षित बनाया है। पहाड़ों से शहरों और दूसरे राज्यों में जाने वाले मजदूर अक्सर बिना सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और कानूनी संरक्षण के काम करते हैं।
भारत का संविधान अनुच्छेद 23 के तहत बेगार और जबरन मजदूरी पर रोक लगाता है। फिर भी जब मजदूर अपनी मजदूरी मांगने से डरता हो, जब कर्ज के बदले श्रम लिया जाता हो, जब बच्चों तक को काम पर धकेला जाता हो—तब यह मान लेना कि बंधुआ मजदूरी इतिहास बन चुकी है, वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा।
बंधुआ मजदूरी के खिलाफ लड़ाई केवल कानून की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और मानवीय गरिमा की लड़ाई है।
क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद की बहसों से नहीं, बल्कि उसके सबसे कमजोर नागरिक की आज़ादी से होती है।
