Spread the love

आकाशवाणी के 90 साल: भरोसे की वह आवाज़ जो आज भी समाज को जोड़ती है

“आकाशवाणी के 90 साल बेमिसाल” — यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय जनसंचार के उस इतिहास की प्रतिध्वनि है जिसने पीढ़ियों को सूचना, संस्कृति और संवेदनाओं के सूत्र में बाँधे रखा। Akashvani (All India Radio) नजीबाबाद केंद्र द्वारा आयोजित वॉकेथॉन रैली इसी ऐतिहासिक यात्रा का सार्वजनिक उत्सव बनकर सामने आई, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों की उल्लेखनीय भागीदारी दिखाई दी।

आकाशवाणी नजीबाबाद केंद्र से शुरू हुई यह रैली केवल शहर की सड़कों पर निकला एक कार्यक्रम नहीं था; यह उस सामाजिक विश्वास का प्रदर्शन था जो दशकों से रेडियो ने अर्जित किया है। डबल फाटक फ्लाईओवर, मालगोदाम तिराहा, कृष्ण टॉकीज चौराहा और रेलवे स्टेशन मार्ग से गुजरती यह यात्रा मानो उस युग को याद कर रही थी जब रेडियो घरों की धड़कन हुआ करता था।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. अंजनी कुमार सहित प्रशासनिक और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की उपस्थिति ने इस आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। उनका यह कथन महत्वपूर्ण है कि आकाशवाणी ने निष्पक्ष और उच्च गुणवत्ता वाले प्रसारण से जनता का विश्वास जीता। आज के समय में यह टिप्पणी और अधिक प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि सूचना का वर्तमान परिवेश तेज़ तो है, पर हमेशा विश्वसनीय नहीं।

सोशल मीडिया के दौर में सूचना की गति बढ़ी है, लेकिन सत्यापन और उत्तरदायित्व की चुनौती भी उतनी ही गंभीर हुई है। ऐसे समय में आकाशवाणी जैसे सार्वजनिक प्रसारक का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वह पुराना माध्यम है, बल्कि इसलिए है कि उसने “विश्वास” को अपनी सबसे बड़ी पूंजी बनाया। यही कारण है कि प्राकृतिक आपदाओं, संकटों और ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी रेडियो सबसे भरोसेमंद संचार माध्यमों में गिना जाता है।

इस वॉकेथॉन में विभिन्न स्कूलों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। मॉडर्न ऐरा मंडावर, आरआर मोरारका द्वारिकेश नगर, आर्यंस कॉन्वेंट एकेडमी और होली फैमिली कॉन्वेंट स्कूल के विद्यार्थियों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि रेडियो की विरासत केवल पुरानी पीढ़ी तक सीमित नहीं है। नई पीढ़ी को यदि सार्थक और विश्वसनीय संवाद की आवश्यकता होगी, तो सार्वजनिक प्रसारण की भूमिका भविष्य में भी बनी रहेगी।

कार्यक्रम में शामिल कलाकारों, साहित्यकारों और श्रोताओं ने अपने अनुभव साझा कर यह भी स्पष्ट किया कि आकाशवाणी केवल समाचारों का मंच नहीं रहा; उसने लोकसंस्कृति, संगीत, साहित्य और सामाजिक चेतना को भी संरक्षण दिया। विशेषकर क्षेत्रीय केंद्रों ने स्थानीय भाषाओं और लोकधुनों को जीवित रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

लेकिन इस अवसर पर एक आवश्यक प्रश्न भी उठता है — क्या सार्वजनिक प्रसारण संस्थाएँ बदलते मीडिया परिदृश्य में अपनी स्वतंत्रता और सामाजिक सरोकारों को उसी मजबूती से बचाए रख पाएंगी? लोकतंत्र में सार्वजनिक प्रसारक की भूमिका केवल सरकारी सूचनाओं तक सीमित नहीं हो सकती। उसे समाज के विविध स्वरों को मंच देना होगा, विशेषकर उन समुदायों को जिनकी आवाज़ बाज़ार आधारित मीडिया में अक्सर दब जाती है।

नजीबाबाद की यह वॉकेथॉन केवल एक स्मृति आयोजन नहीं थी; यह उस विश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन थी जो नौ दशकों से रेडियो और जनता के बीच कायम है। तकनीक बदल सकती है, माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन समाज को जोड़ने वाली विश्वसनीय आवाज़ की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती। यही आकाशवाणी की सबसे बड़ी विरासत है।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *