आवाज़, विरासत और पहाड़ की स्मृतियाँ
भारत में रेडियो प्रसारण के 90 वर्ष पूरे होने का उत्सव केवल राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन क्षेत्रीय केंद्रों की यात्रा का सम्मान भी है जिन्होंने दशकों तक स्थानीय समाज, संस्कृति और जनजीवन को स्वर दिया। Akashvani (All India Radio) नजीबाबाद और देहरादून केंद्र इसी विरासत के महत्वपूर्ण अध्याय हैं, जिनकी आवाज़ ने उत्तर भारत विशेषकर उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य को गहराई से प्रभावित किया है।
नजीबाबाद में आयोजित 90वीं वर्षगांठ की वॉकाथॉन केवल एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम नहीं थी; वह इस तथ्य की सार्वजनिक स्वीकृति थी कि रेडियो अब भी लोगों की सामूहिक स्मृतियों में जीवित है। डबल फाटक फ्लाईओवर से रेलवे स्टेशन तक निकली यह यात्रा दरअसल उन नौ दशकों की यात्रा का रूपक थी जिसमें रेडियो ने गाँवों, कस्बों और सीमित संसाधनों वाले समाज को देश-दुनिया से जोड़े रखा।
देहरादून केंद्र का इतिहास भी इसी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिमालयी क्षेत्र की लोकसंस्कृति, लोकभाषाओं, लोकसंगीत और जनचेतना को संरक्षित करने में आकाशवाणी देहरादून की भूमिका ऐतिहासिक रही है। गढ़वाली और कुमाऊँनी लोकगीतों से लेकर कृषि कार्यक्रमों, मौसम संबंधी सूचनाओं, आपदा चेतावनियों और साहित्यिक प्रसारणों तक — इस केंद्र ने पहाड़ की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया। उत्तराखंड आंदोलन के दौर में भी रेडियो अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बना रहा।
आज जब डिजिटल मीडिया के विस्तार ने सूचना को तेज़ तो बना दिया है, लेकिन विश्वसनीयता को कमजोर भी किया है, तब आकाशवाणी जैसे सार्वजनिक प्रसारक का महत्व और बढ़ जाता है। रेडियो का चरित्र बाज़ार आधारित कम और समाज आधारित अधिक रहा है। यही कारण है कि इंटरनेट बंद होने, प्राकृतिक आपदाओं या संचार संकट के समय रेडियो अब भी सबसे भरोसेमंद माध्यमों में गिना जाता है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में इसकी उपयोगिता विशेष है। दूरस्थ गाँवों तक समाचार, मौसम सूचना और सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुँचाने में आकाशवाणी देहरादून ने दशकों तक जो भूमिका निभाई, वह केवल प्रसारण नहीं बल्कि सामाजिक सेवा थी। नजीबाबाद केंद्र ने भी मैदानी और सीमावर्ती क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया।
लेकिन 90 वर्षों के इस अवसर पर एक आत्ममंथन भी आवश्यक है। क्या सार्वजनिक प्रसारण संस्थाएँ बदलती पीढ़ियों से पर्याप्त संवाद बना पा रही हैं? क्या स्थानीय भाषाओं और क्षेत्रीय पत्रकारिता को पर्याप्त स्थान मिल रहा है? क्या रेडियो को केवल सरकारी सूचना तंत्र के रूप में सीमित कर देना उसकी मूल लोकतांत्रिक भूमिका को कमजोर नहीं करेगा?
रेडियो की शक्ति उसकी सादगी और विश्वसनीयता में है। वह दृश्य उत्तेजना नहीं, बल्कि विचार और संवेदना का माध्यम है। आकाशवाणी नजीबाबाद और देहरादून की विरासत हमें यह याद दिलाती है कि तकनीक बदल सकती है, लेकिन समाज को जोड़ने वाली सच्ची आवाज़ कभी अप्रासंगिक नहीं होती।
