Spread the love

संपादकीय: उत्तराखंड में परिसीमन—क्या पहाड़ का राजनीतिक अस्तित्व सिमट रहा है?

उत्तराखंड राज्य का निर्माण केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का परिणाम नहीं था, बल्कि यह एक लंबे जनांदोलन, त्याग और क्षेत्रीय असंतुलन के खिलाफ उठी आवाज़ का परिणाम था। पहाड़ के लोगों ने इस उम्मीद के साथ राज्य का सपना देखा था कि उन्हें अपनी भौगोलिक परिस्थितियों और सामाजिक जरूरतों के अनुरूप शासन मिलेगा। लेकिन आज वही पहाड़ अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सिकुड़ते दायरे को लेकर आशंकित है।

2002 में जब पहली बार Uttarakhand की विधानसभा का गठन हुआ, तब 70 सीटों में से 40 सीटें पहाड़ी जिलों के पास थीं—यानी लगभग 54%। यह संतुलन राज्य निर्माण की मूल भावना के अनुरूप था। लेकिन 2012 के परिसीमन के बाद यह घटकर 34 सीटों (लगभग 49%) तक रह गया। अब यदि आगामी परिसीमन पूरी तरह जनसंख्या आधारित होता है, तो यह संख्या और घटकर 24–25 सीटों तक पहुंच सकती है, जो लगभग 35% प्रतिनिधित्व होगा।

यह मात्र आंकड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि एक गहरे संरचनात्मक संकट का संकेत है।

भारत में निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण Delimitation Commission of India के माध्यम से किया जाता है, जिसका मुख्य आधार जनसंख्या है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जनसंख्या ही प्रतिनिधित्व का एकमात्र मानदंड होना चाहिए, विशेषकर उन राज्यों में जहाँ भौगोलिक परिस्थितियाँ अत्यंत विषम हैं?

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कम है, लेकिन भौगोलिक विस्तार, दुर्गमता और प्रशासनिक चुनौतियाँ कहीं अधिक हैं। यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण किया जाएगा, तो स्वाभाविक रूप से मैदानी क्षेत्रों का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ेगा। इसका सीधा प्रभाव नीतिगत प्राथमिकताओं पर पड़ेगा—जहाँ पहाड़ की समस्याएँ हाशिये पर चली जाएंगी।

संविधान में पहले से ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहाँ क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता दी गई है। Article 371 के तहत कुछ राज्यों को विशेष प्रावधान दिए गए हैं ताकि उनकी भौगोलिक और सांस्कृतिक विशिष्टताओं की रक्षा हो सके। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उत्तराखंड के लिए भी कोई विशेष व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?

यह मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है। चाहे वह भाजपा हो, कांग्रेस या क्षेत्रीय दल—यह सभी के लिए एक साझा चुनौती है। क्योंकि यदि पहाड़ का प्रतिनिधित्व लगातार घटता रहा, तो इसका असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। यह विकास, संसाधनों के वितरण, और अंततः पलायन जैसे गंभीर सामाजिक प्रश्नों को और गहरा करेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि परिसीमन की प्रक्रिया को केवल जनसंख्या के गणित तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसमें भौगोलिक विषमता, दुर्गमता और प्रशासनिक आवश्यकताओं को भी शामिल किया जाए। अन्यथा, जिस राज्य के लिए संघर्ष किया गया, उसी के मूल चरित्र पर संकट खड़ा हो सकता है।

उत्तराखंड के संदर्भ में यह केवल सीटों का मामला नहीं है—यह पहाड़ के अस्तित्व, अस्मिता और भविष्य का प्रश्न है।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *