वनों का संकट दरअसल भविष्य का संकट है—और इसका समाधान आज के निर्णयों में ही छिपा है।
वन बचेंगे तो भविष्य बचेगा — उत्तराखंड और गढ़वाल के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस
आज, अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस केवल एक प्रतीकात्मक अवसर नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और प्रकृति के बीच संतुलन को समझने का महत्वपूर्ण दिन है। वन पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र की रीढ़ हैं, जो जैव विविधता, जलवायु नियंत्रण और मानव जीवन के संरक्षण में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जहां हर वर्ष लगभग 1.2 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो रहा है, वहीं भारत के पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में यह संकट एक अलग ही आयाम ले लेता है। यहां वन केवल पर्यावरणीय संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और आजीविका का आधार हैं।
विशेष रूप से गढ़वाल मंडल के वन जल स्रोतों, नदियों और हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। गंगा और उसकी सहायक नदियों का उद्गम क्षेत्र होने के कारण, गढ़वाल के वन पूरे उत्तर भारत की जल सुरक्षा से सीधे जुड़े हुए हैं। यहां के वन वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं और भूस्खलन, बाढ़ तथा बादल फटने जैसी आपदाओं के प्रभाव को कम करने में प्राकृतिक ढाल का कार्य करते हैं।
उत्तराखंड में वनों और समाज के बीच संबंध ऐतिहासिक और भावनात्मक दोनों हैं। चिपको आंदोलन इसकी एक सशक्त मिसाल है, जिसने दुनिया को यह संदेश दिया कि जनभागीदारी से ही वन संरक्षण संभव है। आज भी पहाड़ों में महिलाएं और स्थानीय समुदाय वन संरक्षण की अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं।
इसके बावजूद, राज्य में अनियोजित विकास, सड़क चौड़ीकरण, जलविद्युत परियोजनाएं और पर्यटन के दबाव ने वनों पर गंभीर खतरा उत्पन्न किया है। गढ़वाल क्षेत्र में लगातार बढ़ती आपदाएं इस असंतुलन की चेतावनी हैं। वन क्षेत्र में कमी और पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण का सीधा प्रभाव जल स्रोतों के सूखने और कृषि पर पड़ रहा है।
नीतिगत स्तर पर Forest Conservation Act 1980 और Forest Rights Act 2006 जैसे कानून मौजूद हैं, लेकिन उत्तराखंड जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इनका प्रभावी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप क्रियान्वयन अत्यंत आवश्यक है। वन पंचायतों को मजबूत करना, स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना और पारंपरिक ज्ञान को नीति में स्थान देना समय की मांग है।
आज आवश्यकता है कि विकास के वर्तमान मॉडल की पुनर्समीक्षा की जाए। उत्तराखंड और गढ़वाल के लिए “ईको-सेंसिटिव विकास” (पर्यावरण-संवेदी विकास) ही एकमात्र स्थायी विकल्प है, जिसमें वन संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए।
अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या हम अपने प्राकृतिक संसाधनों के साथ न्याय कर पा रहे हैं? उत्तराखंड और गढ़वाल के वन केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक धरोहर हैं।
यदि हिमालय के वन सुरक्षित रहेंगे, तो ही नदियां, जलवायु और जीवन सुरक्षित रहेगा। अब समय है—संकल्प को जमीनी कार्रवाई में बदलने का।
