संपादकीय | क्या आज भी कलम का युग है?
यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या आज के शोर, प्रचार और तकनीक के दौर में कलम की कोई प्रासंगिकता बची है? उत्तर स्पष्ट है—हाँ, बल्कि पहले से अधिक।
कलम केवल स्याही और काग़ज़ का नाम नहीं है।
कलम वह विवेक है जो सत्ता से सवाल करता है,
वह चेतना है जो समाज को आईना दिखाती है,
और वह साहस है जो अकेले खड़े होकर भी सच लिखता है।
आज का युग तेज़ है—ख़बरें पलभर में वायरल होती हैं,
रायें ट्रेंड में बदल जाती हैं,
और सच कई बार शोर में दब जाता है।
ऐसे समय में कलम की ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है—
कि वह जल्दबाज़ी नहीं, गहराई लिखे;
उकसावे नहीं, तथ्य रखे;
और भीड़ के साथ नहीं, सत्य के साथ चले।
यह सच है कि आज हथियार शब्द नहीं,
बल्कि आईटी सेल, अफ़वाह और एल्गोरिदम बन चुके हैं।
लेकिन इन्हीं के बीच अगर कोई ताक़त है
जो झूठ की परतें खोल सकती है,
तो वह है—ईमानदार लेखन।
इतिहास गवाह है—
साम्राज्य तलवार से बने,
लेकिन गिरे कलम के सवालों से।
आपातकाल हो या आज़ादी का आंदोलन,
हर निर्णायक मोड़ पर
कलम ने ही जनता की आवाज़ को दिशा दी।
इसलिए यह कहना कि कलम का युग समाप्त हो गया,
दरअसल कलम से डरने वालों की भाषा है।
आज भी समाज को
नारे नहीं, विवेक चाहिए;
अंधभक्ति नहीं, विश्लेषण चाहिए;
और शोर नहीं, सच लिखने वाली कलम चाहिए।
कलम का युग खत्म नहीं हुआ है—
यह युग कलम की परीक्षा का युग है।
