पौड़ी जनपद के गजेल्ड (गजल्ड) गांव में पिछले कई महीनों से दहशत फैलाने वाले नर-भक्षी गुलदार को आखिरकार वन विभाग की विशेष टीम ने ढेर कर दिया। लगातार ट्रैकिंग, निगरानी और सघन कॉम्बिंग ऑपरेशन के बाद शूटरों की टीम ने बुधवार देर रात इस गुलदार का सफाया कर स्थानीय ग्रामीणों को राहत की सांस दी।
गढ़वाल वन प्रभाग की रिपोर्ट भयावह तस्वीर पेश करती है। पिछले पांच वर्षों में गुलदार के हमलों में 27 लोगों की मौत और 105 से अधिक लोग घायल हुए हैं। वर्ष 2022 सबसे ज्यादा घातक रहा, जब सात मौतें दर्ज की गईं। वहीं 2021 में 25 लोग घायल हुए। वर्ष 2023 में घटनाएं कुछ कम हुईं, और केवल एक मौत दर्ज की गई।
इस वर्ष 2025 में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है। अब तक पांच लोगों की जान जा चुकी है और 25 लोग घायल हुए हैं। पहली मौत 2 जून को पूर्वी अमेली रेंज में हुई थी। इसके बाद पोखड़ा और पौड़ी रेंज में कई हमले लगातार सामने आते रहे।
संपादकीय दृष्टिकोण
पौड़ी में लगातार बढ़ रहे मानव–गुलदार संघर्ष ने पहाड़ी क्षेत्रों की वन-व्यवस्था और मानव बसावट के बीच बन चुके असंतुलन को एक बार फिर सामने ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भोजन की कमी, जंगलों का सिमटना, जलस्रोतों का सूखना और बढ़ती मानव गतिविधियां गुलदारों को गांवों की ओर धकेल रही हैं। परिणामस्वरूप ग्रामीणों का दैनिक जीवन असुरक्षित हो रहा है।
नर-भक्षी गुलदार का मारा जाना राहत देता है, लेकिन यह समाधान नहीं। वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया सराहनीय है, परंतु अब ज़रूरत व्यापक नीति-हस्तक्षेप, वैज्ञानिक मॉनिटरिंग, टेरिटरी मैनेजमेंट और स्थानीय समुदायों को शामिल कर दीर्घकालिक योजना बनाने की है।
यदि मानव–वन्यजीव सह-अस्तित्व की रणनीतियों पर गंभीरता से काम नहीं किया गया तो नरभक्षी घटनाओं की पुनरावृत्ति भविष्य में भी होने की आशंका बनी रहेगी।
