कोटद्वार के लिए लालढंग–चीलरखाल मोटर मार्ग किसी जीवन रेखा से कम नहीं है। यह मार्ग न केवल पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों को जोड़ेगा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और आपदा प्रबंधन के लिहाज़ से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य यह है कि राज्य गठन के 25 साल बाद भी यह मार्ग अधूरा है।
दोषी कौन?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है।
जनता: चुनाव आते ही सड़क की मांग तेज़ होती है, लेकिन चुनाव बीतते ही आवाज़ धीमी पड़ जाती है। जनता का दबाव लगातार बना रहता तो शायद स्थिति बदल सकती थी।
जनप्रतिनिधि: नेताओं ने सड़क निर्माण को सिर्फ़ वादों तक सीमित रखा। सत्ता पाते ही यह मुद्दा हाशिये पर चला गया। 25 साल में कोई भी प्रतिनिधि इस मार्ग को प्राथमिकता नहीं दिला पाया।
जंगल और कानून: कठोर वन्यजीव व पर्यावरणीय कानून भी इस मार्ग की सबसे बड़ी अड़चन रहे। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने में सरकारें नाकाम रहीं।
मानवाधिकार बनाम पर्यावरण
सवाल यह है कि क्या आम आदमी के बुनियादी मानवाधिकार – सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवनयापन – पर्यावरण व वन्यजीवों से कमतर हैं? दोनों के बीच संतुलन ज़रूरी है, परंतु दशकों से केवल एक पक्ष पर ज़ोर देकर जनता के अधिकारों को नज़रअंदाज़ किया गया।
लालढंग–चीलरखाल मोटर मार्ग का निर्माण सिर्फ़ सड़क बनाने का सवाल नहीं है, यह जनता की उपेक्षा, जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन चुका है। अब समय है कि जनता अपनी आवाज़ बुलंद करे और विकास व पर्यावरण दोनों का संतुलन बनाते हुए इस मार्ग को हकीकत में बदले।
