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संपादकीय |

जब खेती बाजार के हवाले होती जा रही है, तब एक आदिवासी किसान ने साबित किया कि बीज केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति, प्रकृति की विविधता और आने वाली पीढ़ियों की अमानत हैं।

केरल के वायनाड के आदिवासी किसान चेरुवयल रमन की कहानी केवल एक किसान की कहानी नहीं है। यह उस कृषि दर्शन की कहानी है, जिसमें मिट्टी को सिर्फ उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन का आधार माना जाता है। कक्षा पांच तक पढ़े रमन ने धान की 50 से अधिक पारंपरिक किस्मों को सहेजकर यह दिखाया कि ज्ञान की पहचान केवल डिग्रियों से नहीं होती। खेत, अनुभव, परंपरा और प्रकृति के साथ संवाद भी ज्ञान के बड़े स्रोत हैं।

उन्हें प्यार से ‘नेल्लाचन’ यानी ‘धान का पिता’ कहा जाता था। उनके पास धान की जो किस्में सुरक्षित थीं, वे केवल बीज नहीं थीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित कृषि अनुभव की जीवित विरासत थीं। प्रत्येक किस्म अपने भीतर मिट्टी, मौसम, पानी और खेती की परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हुए ज्ञान की कहानी समेटे हुए थी।

रमन के निधन की खबर हमें एक ऐसे समय में ठहरकर सोचने का अवसर देती है, जब कृषि को अधिक उत्पादन, महंगे निवेश और बाजार की मांग के चश्मे से देखा जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि आधुनिक कृषि विज्ञान कितना उपयोगी है। सवाल यह है कि क्या आधुनिकता की दौड़ में हम उस पारंपरिक ज्ञान को भी खो रहे हैं, जिसे विकसित करने में समुदायों ने सदियां लगाई हैं?

बीजों का संरक्षण, भविष्य की सुरक्षा

खेती की विविधता प्रकृति की ताकत है। अलग-अलग पारंपरिक किस्मों में सूखा, अधिक वर्षा, स्थानीय मिट्टी और अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति अलग-अलग विशेषताएं हो सकती हैं। यही विविधता बदलती जलवायु के दौर में कृषि को अधिक अनुकूल बनाने के विकल्प उपलब्ध कराती है।

लेकिन जब खेती कुछ चुनिंदा व्यावसायिक किस्मों तक सीमित होने लगती है, तब स्थानीय बीजों और उनसे जुड़े ज्ञान के लुप्त होने का खतरा बढ़ता है। बाजार की मांग और अधिक उपज की अपेक्षा के बीच वे फसलें पीछे छूट सकती हैं, जिन्हें किसानों के पूर्वजों ने अपनी जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया था।

चेरुवयल रमन ने इस चुनौती का जवाब किसी बड़े संस्थान या महंगी प्रयोगशाला के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने खेत और पारिवारिक परंपरा के सहारे दिया। उन्होंने धान की विभिन्न किस्मों को अलग-अलग उगाकर उनकी पहचान बनाए रखने का प्रयास किया।

उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि बीज संरक्षण केवल कृषि विभागों, अनुसंधान संस्थानों या बीज बैंकों की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें किसानों, आदिवासी समुदायों, स्थानीय संस्थाओं और सरकारों की बराबर की भूमिका होनी चाहिए।

आदिवासी समाज का ज्ञान हमारी विकास नीति में कहां है?

चेरुवयल रमन की कहानी भारतीय समाज के सामने एक असहज प्रश्न भी रखती है। जिन समुदायों ने जंगल, जल, जमीन और जैव विविधता के साथ सह-अस्तित्व की परंपराएं विकसित कीं, क्या उनके ज्ञान को हमारी विकास नीतियों में पर्याप्त सम्मान मिलता है?

आदिवासी समुदायों का पारंपरिक ज्ञान अक्सर लिखित पुस्तकों के बजाय अनुभव, व्यवहार और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण के माध्यम से आगे बढ़ता है। इस ज्ञान को केवल लोकपरंपरा मानकर नजरअंदाज करना एक बड़ी भूल होगी। हालांकि, हर पारंपरिक पद्धति को बिना वैज्ञानिक परीक्षण के सही मान लेना भी उचित नहीं है। जरूरत दोनों के बीच सार्थक संवाद की है।

आधुनिक कृषि विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान स्थानीय बीजों की विशेषताओं को समझ सकता है, जबकि किसानों का अनुभव शोध को वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ सकता है। दोनों के सहयोग से ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जो उत्पादन के साथ मिट्टी की सेहत, जैव विविधता और किसानों की आजीविका का भी ध्यान रखे।

इसके लिए जरूरी है कि पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण संबंधित समुदायों की सहमति और उनके अधिकारों के सम्मान के साथ किया जाए। बीजों और उनसे जुड़े ज्ञान से होने वाले लाभ में स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

उत्तराखंड के पहाड़ों के लिए भी है एक बड़ा सबक

चेरुवयल रमन की कहानी उत्तराखंड के लिए भी प्रासंगिक है। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक अनाजों, स्थानीय बीजों, मिश्रित खेती और जंगलों पर आधारित आजीविका की समृद्ध परंपराएं रही हैं। मंडुवा, झंगोरा, चौलाई, गहत, भट्ट और राजमा जैसे स्थानीय उत्पाद केवल खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि क्षेत्र की कृषि परिस्थितियों और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।

आज पहाड़ों में खेती के सामने पलायन, जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान, बढ़ती लागत, बाजार तक सीमित पहुंच और खेती से कम होती आय जैसी चुनौतियां हैं। ऐसे में केवल किसानों को अधिक उत्पादन करने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि उनकी उपज को उचित मूल्य मिले, स्थानीय बीज सुरक्षित रहें और खेती आर्थिक रूप से टिकाऊ बने।

उत्तराखंड में गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए पारंपरिक कृषि ज्ञान को आधुनिक प्रसंस्करण, स्थानीय उद्यमों और बाजार से जोड़ा जा सकता है। मंडुवा, झंगोरा, गहत और अन्य स्थानीय उत्पादों की गुणवत्ता, पहचान तथा मूल्यवर्धन पर काम करके ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बनाए जा सकते हैं।

इसके साथ ही गांवों में सामुदायिक बीज बैंक स्थापित करने, स्थानीय बीजों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण करने और अनुभवी किसानों के ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है। कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों, ग्राम पंचायतों और किसान समूहों को मिलकर ऐसी पहल करनी चाहिए।

यह काम केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। स्थानीय समुदायों को इसके केंद्र में रखना होगा।

किसान केवल अन्नदाता नहीं, जैव विविधता के संरक्षक भी हैं

चेरुवयल रमन का महत्व इसलिए नहीं है कि उन्होंने किसी असाधारण तकनीक का आविष्कार किया। उनका महत्व इस बात में है कि उन्होंने उस ज्ञान को मिटने नहीं दिया, जिसे बाजार की नजर में शायद तत्काल लाभ का साधन नहीं माना जाता।

उनकी कहानी खेती के बारे में हमारी सोच को व्यापक बनाने का आग्रह करती है। किसान केवल अनाज पैदा करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह मिट्टी, पानी, मौसम, बीज और स्थानीय पारिस्थितिकी के बीच संबंधों को समझने वाला ज्ञानधारी भी है।

यदि ऐसे किसानों के पास सुरक्षित बीजों की विरासत है, तो समाज और सरकार की जिम्मेदारी है कि उनके अनुभवों को दर्ज किया जाए, उनके काम को सम्मान मिले और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की व्यवस्था बने।

यह भी समझना होगा कि किसी व्यक्ति के निधन के साथ उसकी विरासत अपने आप सुरक्षित नहीं हो जाती। यदि उसके बीजों, खेती के तरीकों और अनुभवों को व्यवस्थित रूप से संरक्षित नहीं किया गया, तो सम्मान के शब्द भी उस नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएंगे।

निष्कर्ष: अगली पीढ़ी के लिए क्या बचाकर जा रहे हैं हम?

विकास की असली परीक्षा केवल इस बात से नहीं होती कि हमने कितना उत्पादन बढ़ाया या कितनी सड़कें बनाईं। यह भी देखना होगा कि विकास की प्रक्रिया में हमने प्रकृति, स्थानीय ज्ञान और समुदायों की विरासत को कितना सुरक्षित रखा।

चेरुवयल रमन हमें याद दिलाते हैं कि भविष्य की सुरक्षा के लिए कभी-कभी अतीत से सीखना जरूरी होता है। खेत में बचाया गया एक पारंपरिक बीज आने वाली पीढ़ियों के लिए नई संभावनाओं का आधार बन सकता है।

उत्तराखंड सहित देश के सभी कृषि प्रधान क्षेत्रों में इस विरासत को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। स्थानीय बीजों का संरक्षण, किसानों के ज्ञान का सम्मान, जैव विविधता की रक्षा और कृषि को लाभकारी बनाना एक ही व्यापक दृष्टि के हिस्से होने चाहिए।

अगली बार जब हमारी थाली में चावल आए, तो हमें केवल उस किसान को याद नहीं करना चाहिए जिसने बीज बचाए। हमें यह भी पूछना चाहिए कि हमारी नीतियां, हमारी खेती और हमारा बाजार उस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए क्या कर रहे हैं।

क्योंकि बीज बचाना केवल खेती बचाना नहीं है—यह भविष्य के लिए विकल्प, प्रकृति के लिए विविधता और समाज के लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने की संभावना बचाना भी है।


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By udaen

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