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— संपादकीय

भारत के पहाड़ों और जंगलों का इतिहास केवल प्राकृतिक सुंदरता का इतिहास नहीं है। यह उन समुदायों के संघर्ष का इतिहास भी है, जिन्होंने सदियों से जंगल, जमीन, पानी और स्थानीय संसाधनों के साथ अपने जीवन का संबंध बनाया। जब-जब बाहरी सत्ता, बाजार या प्रशासनिक व्यवस्था ने इस संबंध को तोड़ने की कोशिश की, प्रतिरोध पैदा हुआ।

छोटानागपुर में बिरसा मुंडा का उलगुलान, हिमालय में औपनिवेशिक वन कानूनों के खिलाफ ग्रामीण प्रतिरोध और उत्तराखंड का चिपको आंदोलन इसी लंबी ऐतिहासिक परंपरा के अलग-अलग अध्याय हैं।

इन आंदोलनों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं। उनके सामाजिक आधार, राजनीतिक संदर्भ और तत्काल उद्देश्य अलग थे। लेकिन इनके भीतर एक साझा प्रश्न दिखाई देता है—

प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार किसका है और उनके उपयोग का निर्णय कौन करेगा?

आज उत्तराखंड के सामने यही प्रश्न एक नए रूप में खड़ा है।


बिरसा का उलगुलान: जमीन से शुरू हुआ सवाल

19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में छोटानागपुर क्षेत्र में मुंडा समाज ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था और स्थानीय शोषणकारी तंत्र के दबाव से जूझ रहा था।

पारंपरिक भूमि व्यवस्था कमजोर की जा रही थी। जमींदारों, ठेकेदारों और साहूकारों का प्रभाव बढ़ रहा था। भूमि से बेदखली और आर्थिक शोषण ने आदिवासी समाज के भीतर गहरा असंतोष पैदा किया।

इसी वातावरण में बिरसा मुंडा का नेतृत्व उभरा।

उन्होंने केवल अंग्रेजी शासन के खिलाफ राजनीतिक प्रतिरोध नहीं किया, बल्कि सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी संदेश दिया।

उनका प्रसिद्ध संदेश—

“अबुआ दिशुम, अबुआ राज”

अर्थात—

अपना देश, अपना राज।

यह केवल सत्ता परिवर्तन का नारा नहीं था। इसके भीतर स्थानीय समुदाय के अपने संसाधनों, अपनी सामाजिक व्यवस्था और अपनी अस्मिता पर अधिकार की आकांक्षा थी।

1899-1900 का उलगुलान ब्रिटिश शासन के लिए गंभीर चुनौती बना। बिरसा की गिरफ्तारी और 1900 में जेल में मृत्यु के बाद भी उनकी विचारधारा समाप्त नहीं हुई।

उनके आंदोलन के बाद भूमि संरक्षण से संबंधित कानूनी व्यवस्थाओं को मजबूत करने की दिशा में कदम उठे और अंततः छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 जैसे कानून अस्तित्व में आए।

इतिहास का यह अध्याय हमें बताता है कि भूमि का प्रश्न केवल संपत्ति का प्रश्न नहीं होता। वह पहचान, आजीविका और सामाजिक अस्तित्व का प्रश्न भी हो सकता है।


हिमालय में भी जंगल केवल लकड़ी नहीं थे

उत्तराखंड के इतिहास को समझने के लिए औपनिवेशिक वन नीति को समझना आवश्यक है।

ब्रिटिश शासन ने हिमालयी क्षेत्रों के जंगलों को धीरे-धीरे वाणिज्यिक संसाधन के रूप में देखना शुरू किया। वन प्रबंधन का उद्देश्य स्थानीय समुदायों की पारंपरिक आवश्यकताओं से हटकर राजस्व और लकड़ी की आपूर्ति की ओर बढ़ा।

वन कानूनों और आरक्षित वनों की व्यवस्था ने स्थानीय लोगों की पारंपरिक पहुंच को सीमित किया।

जिस जंगल से ग्रामीण—

  • ईंधन लेते थे,
  • पशुओं के लिए चारा लाते थे,
  • पत्तियां और अन्य वन उत्पाद जुटाते थे,
  • कृषि के लिए संसाधन प्राप्त करते थे,

वही जंगल धीरे-धीरे सरकारी नियंत्रण की भूमि बनता गया।

यहां संघर्ष का चरित्र अलग था, लेकिन मूल तनाव वही था—

जंगल का मालिक कौन है और जंगल का उपयोग किसके लिए होगा?


वन कानून और ग्रामीण जीवन

उत्तराखंड के पर्वतीय समाज में महिलाओं की भूमिका को इस संघर्ष से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

पुरुषों के रोजगार के लिए बाहर जाने और कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कारण जंगल से जुड़ा दैनिक श्रम बड़ी मात्रा में महिलाओं के हिस्से आया।

ईंधन और चारे के लिए जंगल की दूरी बढ़ने का सीधा अर्थ था—

महिलाओं का श्रम बढ़ना।

जलस्रोत कमजोर होने का अर्थ था—

महिलाओं का श्रम बढ़ना।

वन संसाधनों पर स्थानीय अधिकार सीमित होने का अर्थ था—

ग्रामीण परिवारों की आर्थिक कठिनाई बढ़ना।

इसलिए उत्तराखंड में पर्यावरण का प्रश्न कभी केवल पेड़ों का प्रश्न नहीं रहा।

यह महिला श्रम, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय का प्रश्न भी रहा है।


चिपको: पेड़ बचाने से आगे का आंदोलन

1970 के दशक में उत्तराखंड के पहाड़ों में चिपको आंदोलन ने विश्व का ध्यान आकर्षित किया।

गौरा देवी और रैणी गांव की महिलाओं सहित अनेक ग्रामीणों ने पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले लगाया।

यह दृश्य केवल पर्यावरण आंदोलन का प्रतीक नहीं बना। इसके पीछे पहाड़ी समाज की जीवन-व्यवस्था का संकट था।

पेड़ बचाने का अर्थ था—

पानी बचाना।

मिट्टी बचाना।

चारा बचाना।

ईंधन बचाना।

खेती बचाना।

और अंततः—

गांव बचाना।

चिपको ने पर्यावरणीय बहस को एक महत्वपूर्ण दिशा दी—प्रकृति को केवल औद्योगिक कच्चे माल के रूप में नहीं देखा जा सकता।


उलगुलान और चिपको में समानता क्या है?

बिरसा मुंडा का उलगुलान और चिपको आंदोलन एक ही आंदोलन नहीं थे।

उन्हें ऐतिहासिक रूप से एक जैसा बताना भी उचित नहीं होगा।

लेकिन दोनों में एक महत्वपूर्ण वैचारिक समानता थी—

स्थानीय समुदाय को उसके प्राकृतिक संसाधनों से अलग करके विकास या शासन की कोई व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती।

उलगुलान में जमीन और स्वशासन प्रमुख प्रश्न थे।

चिपको में जंगल, आजीविका और पर्यावरण प्रमुख प्रश्न बने।

लेकिन दोनों के भीतर स्थानीय समाज की आवाज केंद्रीय थी।

यही वह बिंदु है जहां से उत्तराखंड आज अपने भविष्य का प्रश्न पूछ सकता है।


राज्य बनने के बाद क्या बदला?

2000 में उत्तराखंड अलग राज्य बना।

राज्य निर्माण की मांग के पीछे केवल प्रशासनिक सुविधा का प्रश्न नहीं था। पहाड़ के लोगों की एक बड़ी आकांक्षा यह भी थी कि स्थानीय संसाधनों और विकास की प्राथमिकताओं पर स्थानीय समाज की आवाज मजबूत होगी।

लेकिन 26 वर्षों के बाद यह प्रश्न फिर उठता है—

क्या उत्तराखंड का विकास मॉडल वास्तव में पहाड़ की सामाजिक और पारिस्थितिक जरूरतों के अनुरूप बना है?

राज्य के सामने सड़क, रेल, जलविद्युत, पर्यटन, उद्योग और शहरीकरण जैसे विकास के बड़े लक्ष्य हैं।

इनकी आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन हिमालय कोई सामान्य भूभाग नहीं है।

यह भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र है। यहां ढलान, जलधाराएं, भूगर्भीय संरचना और मौसम की परिस्थितियां विकास की सीमाएं निर्धारित करती हैं।

यदि इन सीमाओं को नजरअंदाज किया गया तो विकास की परियोजना स्वयं आपदा का जोखिम बढ़ा सकती है।


क्या हम हिमालय की वहन क्षमता समझ रहे हैं?

उत्तराखंड में बार-बार आने वाली आपदाओं ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया है—

क्या हम प्रकृति की क्षमता से अधिक निर्माण कर रहे हैं?

बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना, भू-धंसाव और सड़क धंसने जैसी घटनाओं को केवल प्राकृतिक आपदा कह देना पर्याप्त नहीं है।

प्राकृतिक घटनाएं होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव मानव हस्तक्षेप से कई गुना बढ़ सकता है।

जब पहाड़ काटे जाते हैं, प्राकृतिक जलनिकासी बाधित होती है, नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण होता है, जंगल कमजोर होते हैं और ढलानों पर अनियोजित निर्माण बढ़ता है, तो आपदा का जोखिम बढ़ता है।

इसलिए असली प्रश्न केवल यह नहीं है कि—

“आपदा क्यों आई?”

प्रश्न यह भी होना चाहिए—

“आपदा आने से पहले हमने क्या किया?”


जलविद्युत: विकास या संतुलन की परीक्षा?

उत्तराखंड के लिए जलविद्युत महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधन है।

लेकिन हिमालयी नदियां केवल बिजली उत्पादन की इकाइयां नहीं हैं।

वे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा हैं।

नदी का प्रवाह, तलछट, जलजीव, आसपास के जंगल, कृषि और स्थानीय बस्तियां एक-दूसरे से जुड़े हैं।

इसलिए हर परियोजना का मूल्यांकन केवल उसकी मेगावाट क्षमता से नहीं किया जाना चाहिए।

हमें पूछना होगा—

  • उसका संचयी पर्यावरणीय प्रभाव क्या है?
  • स्थानीय समुदाय पर उसका प्रभाव क्या है?
  • भूस्खलन और भूगर्भीय जोखिम कितना है?
  • नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर क्या असर होगा?
  • आपदा की स्थिति में जोखिम कितना बढ़ेगा?
  • स्थानीय लोगों को वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिलेगा?

हिमालय में परियोजना की सफलता का पैमाना केवल बिजली उत्पादन नहीं हो सकता।


पर्यटन: अर्थव्यवस्था का अवसर या पारिस्थितिकी पर दबाव?

उत्तराखंड पर्यटन पर निर्भर अर्थव्यवस्था विकसित कर रहा है।

चारधाम यात्रा, धार्मिक पर्यटन, ट्रेकिंग, साहसिक पर्यटन और होमस्टे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अवसर पैदा कर सकते हैं।

लेकिन पर्यटन का एक दूसरा चेहरा भी है।

यदि किसी छोटे पहाड़ी शहर में उसकी क्षमता से कई गुना अधिक वाहन, होटल और पर्यटक पहुंचते हैं, तो जल, कचरा, सीवेज और यातायात की समस्या पैदा होती है।

इसलिए उत्तराखंड को “जितना अधिक पर्यटक, उतना अधिक विकास” की नीति से आगे बढ़कर “सतत पर्यटन” की ओर जाना होगा।

प्रश्न पर्यटकों की संख्या का नहीं, बल्कि—

पर्यटन की वहन क्षमता का है।


भूमि कानून और स्थानीय समाज

उत्तराखंड में भूमि का प्रश्न लगातार संवेदनशील रहा है।

पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि भूमि का क्षरण, पलायन और जमीन की खरीद-बिक्री के साथ-साथ शहरी विस्तार ने भूमि नीति को जटिल बना दिया है।

यहां दो अतियों से बचना जरूरी है।

एक ओर स्थानीय लोगों के भूमि अधिकार और सामाजिक हितों की रक्षा आवश्यक है।

दूसरी ओर निवेश, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों की जरूरत भी वास्तविक है।

इसलिए नीति का उद्देश्य केवल प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि ऐसा संतुलन बनाना होना चाहिए जिसमें—

स्थानीय व्यक्ति अपनी जमीन और भविष्य से बेदखल न हो तथा राज्य आर्थिक अवसरों से भी वंचित न रहे।


उलगुलान का आधुनिक अर्थ

आज उलगुलान का अर्थ हथियार उठाना नहीं है।

लोकतांत्रिक भारत में उलगुलान का अर्थ हो सकता है—

सवाल पूछना।

RTI के माध्यम से सवाल पूछना।

ग्रामसभा में सवाल पूछना।

पर्यावरणीय मंजूरियों पर सवाल पूछना।

विस्थापन और पुनर्वास पर सवाल पूछना।

भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना।

नीतियों में स्थानीय भागीदारी की मांग करना।

और विकास के नाम पर होने वाले पर्यावरणीय नुकसान का वैज्ञानिक मूल्यांकन मांगना।

यही लोकतांत्रिक उलगुलान है।


हिमालय को केवल संसाधन मानने की भूल

उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि हिमालय को हम किस नजर से देखते हैं।

यदि हिमालय केवल—

खनिज है,

नदी है,

जलविद्युत है,

पर्यटन है,

जमीन है,

सड़क का मार्ग है,

तो हमारी नीतियां भी उसी तरह बनेंगी।

लेकिन यदि हिमालय को—

एक जीवित पारिस्थितिक तंत्र और मानव सभ्यता की आधारभूमि

के रूप में देखा जाए, तो विकास की प्राथमिकताएं बदलनी होंगी।

यहां सड़क भी चाहिए और जंगल भी।

रोजगार भी चाहिए और जलस्रोत भी।

पर्यटन भी चाहिए और स्थानीय संस्कृति भी।

ऊर्जा भी चाहिए और नदी का पारिस्थितिक प्रवाह भी।

यही संतुलन उत्तराखंड की असली विकास चुनौती है।


बिरसा से गौरा देवी तक: संघर्ष की एक साझा चेतना

बिरसा मुंडा और गौरा देवी को एक ही ऐतिहासिक आंदोलन का हिस्सा कहना गलत होगा।

लेकिन भारतीय समाज के पर्यावरणीय और सामाजिक आंदोलनों की लंबी परंपरा में दोनों की आवाजें एक महत्वपूर्ण साझा चेतना की ओर संकेत करती हैं—

प्रकृति से मनुष्य का संबंध केवल बाजार का संबंध नहीं है।

जिस जंगल से कोई समुदाय सदियों तक जीवित रहा है, उसे केवल लकड़ी के मूल्य से नहीं मापा जा सकता।

जिस जमीन पर पीढ़ियां बसी हैं, उसे केवल बाजार मूल्य से नहीं समझा जा सकता।

जिस नदी ने गांवों और सभ्यताओं को जीवन दिया है, उसे केवल पानी की मात्रा से नहीं मापा जा सकता।

और जिस पहाड़ ने समाज को आश्रय दिया है, उसे केवल निर्माण सामग्री नहीं माना जा सकता।


अब उत्तराखंड को अपना “उलगुलान” किस रूप में चाहिए?

उत्तराखंड को आज किसी हिंसक विद्रोह की आवश्यकता नहीं है।

उसे आवश्यकता है—

नीतिगत उलगुलान की।

ऐसी राजनीति की जिसमें हिमालय केवल चुनावी भाषण का विषय न हो।

ऐसी नौकरशाही की जिसमें फाइलों से आगे जाकर जमीन की वास्तविकता समझी जाए।

ऐसी विकास नीति की जिसमें वैज्ञानिक अध्ययन केवल औपचारिकता न हों।

ऐसी पंचायत व्यवस्था की जिसमें ग्रामसभा की आवाज वास्तविक निर्णय प्रक्रिया तक पहुंचे।

ऐसी अर्थव्यवस्था की जिसमें गांव केवल पलायन के स्रोत न हों।

ऐसी पर्यटन नीति की जिसमें स्थानीय लोग केवल मजदूर न बनें, बल्कि लाभ के साझेदार बनें।

और ऐसी पर्यावरण नीति की जिसमें जंगल और नदी को विकास के विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि विकास की बुनियाद के रूप में देखा जाए।


सबसे बड़ा सवाल: विकास किसके लिए?

उत्तराखंड में विकास का सवाल अब केवल “कितना विकास हुआ?” तक सीमित नहीं रह सकता।

अब सवाल होना चाहिए—

किसके लिए विकास हुआ?

किसकी जमीन गई?

किसका जंगल गया?

किसका पानी गया?

किसका रोजगार बना?

किसका रोजगार खत्म हुआ?

किसे मुआवजा मिला?

किसे विस्थापित होना पड़ा?

किसे निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया गया?

और सबसे महत्वपूर्ण—

अगली पीढ़ी को हम कैसा उत्तराखंड देकर जाएंगे?

इन प्रश्नों से बचकर कोई भी विकास मॉडल टिकाऊ नहीं हो सकता।


उलगुलान की सबसे बड़ी सीख

बिरसा मुंडा का जीवन हमें यह सिखाता है कि इतिहास में परिवर्तन केवल सत्ता के गलियारों से नहीं आता।

कभी-कभी वह जंगल के भीतर से आता है।

कभी किसी छोटे गांव से।

कभी किसी किसान की आवाज से।

कभी किसी महिला के प्रतिरोध से।

और कभी किसी साधारण नागरिक के उस सवाल से जिसे सत्ता असुविधाजनक समझती है।

उलगुलान हमें याद दिलाता है कि अधिकार मांगने वाला समाज लोकतंत्र का विरोधी नहीं होता; वह लोकतंत्र को अधिक अर्थपूर्ण बनाता है।

आज उत्तराखंड के सामने भी एक चुनाव है।

एक रास्ता वह है जिसमें पहाड़ को लगातार काटकर विकास के आंकड़े बढ़ाए जाएं।

दूसरा रास्ता वह है जिसमें विकास की दिशा ही पहाड़ की प्रकृति, समाज और भविष्य के अनुरूप तय की जाए।

पहला रास्ता तेज दिखाई दे सकता है।

दूसरा कठिन है।

लेकिन हिमालय को बचाने के लिए कठिन रास्ता ही शायद सही रास्ता है।

बिरसा ने कहा था—

“अबुआ दिशुम, अबुआ राज।”

आज उत्तराखंड इस भावना को अपने समय की भाषा में शायद यूं कह सकता है—

“हमारा हिमालय, हमारी भागीदारी, हमारा भविष्य।”

उलगुलान इतिहास की किताब में बंद अध्याय नहीं है।

वह हर उस लोकतांत्रिक आवाज में जीवित है जो पूछती है—

“हमारे संसाधनों पर हमारा अधिकार कितना है और हमारे भविष्य का फैसला हमारे बिना क्यों?”

और जब तक यह सवाल जीवित है,
उलगुलान भी जीवित है।


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By udaen

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