जंगल जल रहे हैं, और सत्ता गिनती में व्यस्त है
उत्तराखंड एक बार फिर जंगलों की आग से झुलस रहा है। पहाड़ों की सांस धुएँ में घुट रही है, जल स्रोत सूख रहे हैं, वन्यजीव भाग रहे हैं और गाँवों के आसपास भय का वातावरण है। लेकिन इसी बीच सरकार ने वन अधिकारियों और कर्मचारियों को जनगणना जैसे गैर-वन कार्यों में लगा दिया। यह केवल प्रशासनिक असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि पर्यावरणीय सुरक्षा के प्रति खतरनाक लापरवाही का संकेत है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने इस मुद्दे पर तीखी टिप्पणी करते हुए उत्तराखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक से जवाब मांगा है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद वन अधिकारियों को गैर-वन कार्यों में क्यों लगाया गया। यह सवाल केवल कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि उस शासन मॉडल पर सवाल है जिसमें आपदा के समय भी प्राथमिकताएँ उलट दी जाती हैं।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं। वे पानी, मौसम, खेती, पर्यटन और लाखों लोगों की आजीविका का आधार हैं। जब जंगल जलते हैं, तो केवल हरियाली नहीं जलती — जलस्रोत सूखते हैं, मिट्टी की पकड़ कमजोर होती है, भूस्खलन बढ़ते हैं और पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर संकट गहराता है।
ऐसे समय में वन विभाग का सबसे बड़ा दायित्व जंगलों की निगरानी, आग रोकथाम और स्थानीय समुदायों के साथ समन्वय का होता है। लेकिन यदि वही अमला जनगणना और कागजी सरकारी अभियानों में उलझा दिया जाए, तो यह व्यवस्था की विफलता ही कही जाएगी।
विडंबना यह भी है कि सरकारें मंचों पर “ग्रीन उत्तराखंड”, “क्लाइमेट रेजिलिएंट हिमालय” और “सतत विकास” की बातें करती हैं, लेकिन जमीन पर जंगलों की रक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन, मानवबल और प्राथमिकता देने में लगातार असफल रहती हैं। वन विभाग पहले से ही कर्मचारियों की भारी कमी, संसाधनों के अभाव और राजनीतिक दबावों से जूझ रहा है। ऊपर से गैर-वन कार्यों का बोझ उसे उसके मूल दायित्व से दूर कर देता है।
यह मामला केवल प्रशासनिक आदेश का नहीं, बल्कि संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी का भी है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि वन अधिकारियों को उनके मूल कार्यों से हटाकर अन्य कार्यों में लगाना पर्यावरणीय संरक्षण के हित में नहीं है। यदि इसके बावजूद ऐसा हो रहा है, तो यह न्यायपालिका के निर्देशों की अवहेलना भी है।
उत्तराखंड के लिए यह चेतावनी का समय है। जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालयी राज्यों को और अधिक संवेदनशील, वैज्ञानिक और जवाबदेह प्रशासन की जरूरत है। जंगलों को बचाने वाले हाथ अगर फाइलों और जनगणना फार्मों में उलझे रहेंगे, तो आने वाले वर्षों में आग केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहेगी — उसका असर समाज, अर्थव्यवस्था और भविष्य पर भी पड़ेगा।
सरकार को चाहिए कि वह तुरंत वन अधिकारियों को गैर-वन कार्यों से मुक्त करे, फायर लाइन, आधुनिक उपकरण, स्थानीय वन पंचायतों और ग्रामीण भागीदारी को मजबूत करे। वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी — जब जंगल जल रहे थे, तब सरकार क्या कर रही थी?
