“जिंदा हूँ साहब!” — जब सिस्टम कहे ‘मर चुके हो’
देश में अजीब दौर चल रहा है—यहां आदमी की मौत सांस रुकने से नहीं, बल्कि फाइल के एक पन्ने से तय होती है। कलम चली, मुहर लगी… और एक जिंदा इंसान “स्वर्गवासी” घोषित हो गया।
अब सोचिए, वह व्यक्ति खुद आपके सामने खड़ा है, बोल रहा है, पहचान बता रहा है… लेकिन सिस्टम कहता है—“आप तो मर चुके हैं!”
यानी अब आपको अपनी जिंदगी का सबूत देना होगा।
यह कोई कहानी नहीं, हकीकत है। देश के कई हिस्सों में लोग सरकारी रिकॉर्ड में “मृत” घोषित हो चुके हैं, जबकि वे पूरी तरह जीवित हैं। और सबसे बड़ा मज़ाक—उन्हें खुद को जिंदा साबित करने के लिए महीनों, कभी-कभी सालों तक दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
कानून के हाथ-पैर क्यों फूल जाते हैं?
कानून की किताबों में हर समस्या का समाधान है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में प्रक्रिया इतनी उलझी हुई है कि न्याय खुद फाइलों में दम तोड़ देता है।
एक बार सिस्टम ने गलती कर दी, तो उसे सुधारने में वही सिस्टम हांफने लगता है।
कागज़ बनाम इंसान
यह विडंबना ही है कि यहां इंसान की मौजूदगी से ज्यादा भरोसा कागज़ पर किया जाता है।
आप जिंदा हैं, यह आपके परिवार, पड़ोसी और समाज जानते हैं—लेकिन जब तक फाइल में सुधार नहीं होगा, आप “कानूनी रूप से मृत” ही रहेंगे।
सबसे बड़ा सवाल
क्या हमारी व्यवस्था इतनी निर्जीव हो चुकी है कि वह एक जिंदा इंसान को पहचानने में असमर्थ हो?
या फिर यह मान लिया जाए कि यहां जिंदगी से ज्यादा कागज़ की अहमियत है?
अंत में
कलम की ताकत पर हमें गर्व है, लेकिन जब यही कलम बिना जिम्मेदारी के चलती है, तो वह किसी की पूरी जिंदगी मिटा सकती है।
तलवार एक बार मारती है… लेकिन कलम की मार बार-बार लगती है—हर दफ्तर, हर काउंटर, हर दस्तावेज़ में।
