संपादकीय: उत्तराखंड राज्य निर्माण—वामपंथ की अनदेखी विरासत
उत्तराखंड राज्य निर्माण की कहानी अक्सर 1990 के दशक के जनांदोलनों, शहादतों और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई तक सीमित कर दी जाती है। लेकिन यह दृष्टिकोण अधूरा है। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया की वैचारिक जड़ों को समझना हो तो भारतीय वामपंथ, विशेषकर की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
स्वतंत्रता के बाद 1950 के दशक में जब देश नई नीतियों और विकास मॉडल की दिशा तय कर रहा था, तब पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याएं मुख्यधारा की राजनीति में हाशिए पर थीं। इसी दौर में जैसे नेताओं ने पर्वतीय समाज की आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। 1952 के आम चुनावों में भले ही अलग राज्य की मांग स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई थी, लेकिन भूमि सुधार, वन संसाधनों पर स्थानीय अधिकार और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे मुद्दे लगातार उठाए गए। यही वे प्रश्न थे, जो आगे चलकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन की बुनियाद बने।
यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड के सामाजिक आंदोलनों—चाहे वह वन संरक्षण की लड़ाई हो या पलायन के खिलाफ आवाज—इनमें वामपंथी सोच का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। संसाधनों पर स्थानीय समुदाय का अधिकार, विकास के मॉडल पर सवाल और राज्य की नीतियों की आलोचना—ये सभी तत्व वामपंथी राजनीति की देन रहे हैं।
1990 के दशक में जब उत्तराखंड राज्य आंदोलन निर्णायक चरण में पहुंचा, तब राष्ट्रीय राजनीति में भी परिवर्तन का दौर था। गठबंधन युग में क्षेत्रीय आकांक्षाओं को अधिक महत्व मिलने लगा। इस संदर्भ में जैसे नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही, जिन्होंने संघीय ढांचे के भीतर छोटे राज्यों की जरूरत को वैचारिक वैधता दी। यद्यपि उत्तराखंड राज्य का गठन 2000 में हुआ, लेकिन इसके पहले के वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर जो सहमति बनी, उसमें वामपंथ का योगदान नकारा नहीं जा सकता।
फिर भी, यह सवाल बना रहता है कि इतनी वैचारिक उपस्थिति के बावजूद वामपंथ उत्तराखंड आंदोलन का केंद्रीय चेहरा क्यों नहीं बन सका? इसका उत्तर संगठनात्मक सीमाओं और बदलती राजनीति में निहित है। पहाड़ में क्षेत्रीय पहचान की राजनीति ने वर्ग आधारित विमर्श को पीछे छोड़ दिया, और आंदोलन का नेतृत्व गैर-दलीय व क्षेत्रीय समूहों के हाथ में चला गया।
आज, जब उत्तराखंड अपने अस्तित्व के दो दशक से अधिक समय पूरा कर चुका है, तब यह जरूरी है कि राज्य निर्माण की इस यात्रा को व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए। यह केवल भावनात्मक आंदोलन नहीं था, बल्कि दशकों से उठ रहे सामाजिक-आर्थिक प्रश्नों का परिणाम था—जिन्हें सबसे पहले संगठित रूप से उठाने का कार्य वामपंथ ने किया।
उत्तराखंड की राजनीति और नीति-निर्माण के वर्तमान दौर में, यह स्मरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें बताता है कि राज्य निर्माण केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि विचारों के दीर्घकालिक संघर्ष का परिणाम होता है।
