📰 संपादकीय | पौड़ी की धरोहरें खामोशी में क्यों मर रही हैं?
पौड़ी गढ़वाल कभी उत्तराखंड की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्रशासनिक आत्मा रहा है। देवप्रयाग, कंडोलिया, क्यूंकालेश्वर, देवलगढ़ किला, प्राचीन नौले-धारे और पारंपरिक गाँव — यह सब सिर्फ़ पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि पौड़ी की पहचान और इतिहास हैं। लेकिन आज यही धरोहरें सबसे ज़्यादा उपेक्षा और लापरवाही की शिकार हैं।
देवलगढ़ जैसे ऐतिहासिक किले खंडहर बनते जा रहे हैं। कंडोलिया और आसपास के क्षेत्रों में अवैध निर्माण बढ़ रहा है। सैकड़ों साल पुराने नौले-धारे सूख रहे हैं या पाट दिए गए हैं, और प्रशासन के पास न कोई ठोस सूची है, न संरक्षण की स्पष्ट नीति।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
जब पौड़ी ही गढ़वाल की आत्मा है, तो उसे यूँ मरने के लिए क्यों छोड़ दिया गया?
विकास के नाम पर पौड़ी को या तो नजरअंदाज किया गया, या फिर बिना संवेदनशीलता के योजनाएँ थोपी गईं। सड़कें बनीं, लेकिन धरोहरें टूटीं। भवन खड़े हुए, लेकिन इतिहास गिरता चला गया। जो लोग सवाल उठाते हैं, उन्हें “विकास विरोधी” कहकर चुप कराने की कोशिश होती है।
यह विडंबना ही है कि जहाँ एक ओर सरकार पर्यटन बढ़ाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर पर्यटन की असली पूंजी — धरोहरें — ही खत्म होती जा रही हैं। बिना इतिहास और संस्कृति के पर्यटन सिर्फ़ दिखावा बनकर रह जाता है।
पौड़ी को आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत है —
- जिले-वार धरोहर स्थलों की सार्वजनिक सूची
- देवलगढ़, क्यूंकालेश्वर, प्राचीन नौलों का तत्काल संरक्षण
- अवैध निर्माण पर सख़्त कार्रवाई
- स्थानीय समाज और पंचायतों की निर्णायक भागीदारी
यह लड़ाई सिर्फ़ सरकार की नहीं है। अगर पौड़ी का समाज, युवा और बुद्धिजीवी आज नहीं बोले, तो कल इतिहास सिर्फ़ यही लिखेगा कि
“पौड़ी ने अपनी धरोहरें चुपचाप खो दीं।”
अब वक्त है कि पौड़ी उठ खड़ी हो।
धरोहरें बचेंगी, तो ही पौड़ी बचेगा।
और अगर पौड़ी बचेगा — तभी गढ़वाल बचेगा।
