पद्म सम्मान : गरिमा का प्रतीक या विशेषाधिकार का साधन?
— विचार कॉलम
भारत सरकार द्वारा प्रदत्त पद्म सम्मान देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में गिने जाते हैं। इनका उद्देश्य उन व्यक्तियों को सार्वजनिक सम्मान देना है, जिन्होंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा समाज, संस्कृति, साहित्य, कला, विज्ञान, पत्रकारिता या जनसेवा को समर्पित किया है। किंतु हाल के वर्षों में यह प्रश्न बार-बार उठने लगा है कि क्या इन सम्मानों को अपने नाम के आगे जोड़कर स्वयं को समाज से अलग श्रेणी में स्थापित करना और उससे सुविधाएँ प्राप्त करना उचित है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 18 इस विषय में पूर्णतः स्पष्ट है। संविधान किसी भी नागरिक को राज्य द्वारा दी गई उपाधि को अपने नाम का स्थायी हिस्सा बनाने की अनुमति नहीं देता। पद्म सम्मान उपाधि नहीं हैं, बल्कि सम्मान स्वरूप दिए गए अलंकरण हैं। इन्हें पहचान नहीं, प्रेरणा का माध्यम होना चाहिए।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि कहीं-कहीं पद्म सम्मान को सामाजिक प्रभाव, प्रशासनिक प्राथमिकता या विशेष व्यवहार प्राप्त करने के औजार के रूप में देखा जाने लगा है। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक समानता की भावना के विपरीत है, बल्कि स्वयं उस सम्मान की गरिमा को भी आहत करती है, जिसे देश सर्वोच्च मानकर प्रदान करता है।
पद्म सम्मान का वास्तविक अर्थ है—अधिक जिम्मेदारी। यह अपेक्षा करता है कि सम्मानित व्यक्ति समाज के लिए और अधिक अनुकरणीय बने, न कि स्वयं को आम नागरिक से ऊपर माने। इतिहास साक्षी है कि जिन महापुरुषों ने इन सम्मानों को गौरवपूर्ण बनाया, वे सादगी, विनम्रता और निरंतर सेवा के प्रतीक रहे। उन्होंने सम्मान को कभी ढाल नहीं बनाया, बल्कि उसे मौन रूप से आत्मसात किया।
सरकार की जिम्मेदारी है कि पद्म सम्मानों के उपयोग को लेकर स्पष्ट और कठोर दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित करे। वहीं समाज को भी सजग रहना होगा कि वह व्यक्ति को उसके वर्तमान कर्म और सामाजिक योगदान से पहचाने, न कि नाम के साथ जुड़े किसी अलंकरण से।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि पद्म सम्मान किसी को समाज से ऊपर नहीं उठाता, बल्कि समाज के प्रति और अधिक उत्तरदायी बनाता है। यदि यह भावना कमजोर पड़ी, तो सम्मान तो रह जाएगा, पर उसकी आत्मा खो जाएगी। लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद और पहचान आज भी—एक जिम्मेदार नागरिक होना ही है।
