सम्मान का फैसला, अपमान की ज़मीन
(संपादकीय)
दुनियाभर में सेक्स वर्कर्स हिंसा, शोषण और उपेक्षा के त्रिकोण में फँसे हुए हैं। भारत में तीन वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स वर्क को पेशे के रूप में स्वीकार करते हुए यह कहा था कि सेक्स वर्कर्स भी सम्मान, सुरक्षा और स्वाभिमान के साथ जीवन जीने के हक़दार हैं। यह फैसला ऐतिहासिक था—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह इतिहास ज़मीन पर उतर पाया?
अदालत ने स्पष्ट किया कि सहमति से किया गया सेक्स वर्क अपराध नहीं है, और पुलिस या प्रशासन को उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। परंतु वास्तविकता यह है कि फैसले के बाद भी सेक्स वर्कर्स की ज़िंदगी में डर, हिंसा और अपमान की स्थितियाँ जस की तस बनी हुई हैं। कानून बदला, लेकिन व्यवस्था की मानसिकता नहीं बदली।
आज भी पुलिस छापे “नैतिकता” के नाम पर होते हैं। हिंसा की शिकायत दर्ज कराने पर उलटे सवाल सेक्स वर्कर से ही पूछे जाते हैं। अस्पताल, थाने और अदालत—तीनों जगह उन्हें पहले अपने पेशे के लिए सफ़ाई देनी पड़ती है, फिर अपने अधिकार की बात रखने का अवसर मिलता है। यह स्थिति साफ़ बताती है कि सम्मान केवल न्यायिक आदेश से नहीं आता, वह सामाजिक स्वीकृति और संस्थागत व्यवहार से पैदा होता है।
हिंसा यहाँ केवल शारीरिक नहीं है। यह आर्थिक भी है, जब मेहनत का पैसा नहीं दिया जाता। यह मानसिक भी है, जब पहचान छुपाकर जीने को मजबूर किया जाता है। और यह संस्थागत भी है, जब राज्य की मशीनरी उनकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लेती। स्वाभिमान तब टूटता है, जब नागरिक अधिकार पेशे की शर्तों में बाँध दिए जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला दरअसल समाज के लिए एक आईना था—यह देखने के लिए कि हम कानून के साथ चलना चाहते हैं या अपनी सुविधाजनक नैतिकता के साथ। दुर्भाग्यवश, हमने दूसरी राह चुनी। सेक्स वर्क को वैध मानने की बात तो स्वीकार की, लेकिन सेक्स वर्कर को नागरिक मानने से अब भी हिचकते हैं।
यह संपादकीय किसी पेशे का महिमामंडन नहीं करता, बल्कि एक मूल प्रश्न उठाता है—क्या लोकतंत्र में सम्मान केवल कुछ चुने हुए नागरिकों का विशेषाधिकार है?
जब तक जवाब “नहीं” में नहीं मिलता, तब तक सम्मान और स्वाभिमान सेक्स वर्कर्स के लिए सिर्फ़ अदालत के शब्द बने रहेंगे, जीवन की सच्चाई नहीं।
