📰 कॉलम: सोच की परतें
🖋️: दुख — जीवन का अनसुना शिक्षक
✍️ लेखक: दिनेश गुसाईं
“मैं अपने दुख को नहीं छोड़ना चाहता,
क्योंकि उसने मुझे जो सिखाया है,
वह किसी भी सुख ने नहीं सिखाया।”
— विन्सेंट वैन गॉग
कभी-कभी कुछ शब्द पूरे जीवन का दर्शन कह देते हैं। वैन गॉग की यह पंक्ति उन्हीं में से एक है।
एक ऐसे समय में जब समाज खुशी की परिभाषा को केवल बाहरी उपलब्धियों से मापने लगा है, वैन गॉग हमें भीतर की ओर लौटने का निमंत्रण देते हैं — उस दुनिया की ओर जहाँ दुख केवल पीड़ा नहीं, बल्कि बोध बन जाता है।
वैन गॉग का जीवन संघर्ष और संवेदना का प्रतीक था। गरीबी, मानसिक अस्थिरता और अकेलेपन के बावजूद उन्होंने अपने टूटे हुए मन को रंगों में ढाला। उनके चित्र — सनफ्लावर, स्टारी नाइट — सिर्फ कला नहीं, आत्मा की पुकार हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि सृजन का सबसे बड़ा स्रोत वही दर्द है, जिसे हम समझने का साहस रखते हैं।
आज के समय में हम दुख से भागते हैं —
हम उसे सोशल मीडिया की चमक में छिपा देते हैं,
काउंसलिंग के नाम पर दबा देते हैं,
या मनोरंजन के शोर में भुला देते हैं।
परंतु सच्चाई यह है कि दुख से भागने वाला समाज अपनी गहराई खो देता है।
जो व्यक्ति अपने दुख को स्वीकारता है, वह खुद को जानने की दिशा में बढ़ता है।
पत्रकारिता, साहित्य और कला — तीनों का केंद्र यही अनुभव है।
एक पत्रकार तभी सच्चाई लिख सकता है जब उसने समाज के दर्द को महसूस किया हो।
एक कवि तभी गहराई रच सकता है जब उसने अपने भीतर के खालीपन को जाना हो।
और एक कलाकार तभी रोशनी पा सकता है जब उसने अंधेरे से समझौता करना सीख लिया हो।
वैन गॉग हमें याद दिलाते हैं कि सुख हमें स्थिर करता है, लेकिन दुख हमें परिष्कृत करता है।
हमें अपने दुख से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उससे संवाद करना चाहिए।
क्योंकि वही हमें संवेदनशील, सहनशील और सृजनशील बनाता है।
शायद वैन गॉग इसलिए अपने दुख को छोड़ नहीं पाए —
क्योंकि उन्होंने उसमें अपने अस्तित्व की रोशनी देख ली थी।
🪶 “सुख हमें थामे रखता है,
पर दुख हमें गढ़ता है।”
