देहरादून, — संस्कृति विभाग के प्रेक्षागृह में पहाड़ की मिट्टी की खुशबू से भरा एक ऐतिहासिक क्षण रचा गया।
https://youtu.be/1VXg7xk9Qcs?si=zD0ui96TT-oW5jEj
यह कोई साधारण सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि पहाड़ की उन भूली-बिसरीhttps://youtu.be/Rz43IIbch9E?feature=shared लोककलाओं का पुनर्जागरण था, जिनकी हँसी, तंज़ और गीत कभी हर गाँव की रात को जीवन से भर देते था।
मंच पर थे वे कलाकार — नचाढ़ और ग़मत के लोकनायक, जो कभी पहाड़ की हर शादी, हर त्योहार और हर चौक की आत्मा हुआ करते थे।
केकैलाश नेगी और संदीप की जोड़ी
कल जब उन्होंने देहरादून के मंच पर प्रस्तुति दी, तो लगा मानो पहाड़ खुद शहर में उतर आया हो।
72 वर्षीय श्याम लाल जी की प्रस्तुति ने बाँध दी सबकी साँसें
जब 72 वर्षीय श्याम लाल जी ने अपने पारंपरिक अंदाज़ में प्रस्तुति दी, तो सभागार ठहर गया।
उनकी आवाज़ में वो पुरानी रातें, वो पहाड़ी हँसी और वो अपनापन बोल उठा जिसने दर्शकों की आँखों में नमी और चेहरों पर मुस्कान ला दी।
यह प्रस्तुति सिर्फ कला नहीं थी — यह वक्त से संवाद था।
कवि किशना बगोट जी के प्रयास से मंच पर लौटी परंपरा
यह कार्यक्रम प्रसिद्ध हास्य कवि श्री किशना बगोट जी के अथक प्रयासों से संभव हुआ, जिन्होंने इन भुला दिए गए कलाकारों को पहली बार देहरादून के बड़े मंच पर लाया।
यह आयोजन दर्शाता है कि अगर इच्छा और सम्मान हो, तो लोकसंस्कृति आज भी अपनी जड़ों से जुड़ सकती है।
तालियों में थी स्मृति और कृतज्ञता
पूरे प्रेक्षागृह में गूँजती तालियाँ सिर्फ प्रशंसा नहीं थीं — वे उस परंपरा, उस लोकधारा और उन कलाकारों के प्रति कृतज्ञता थीं जिन्होंने कभी पहाड़ को हँसी और गीतों से जोड़ा था।
https://youtu.be/xFNCF9W-xqg?feature=shared
नचाढ़ और ग़मत सिर्फ नाच या अभिनय नहीं हैं, वे हमारी सांस्कृतिक स्मृति और पहचान हैं — जहाँ पहाड़ की भाषा, व्यंग्य, प्रेम और पीड़ा एक साथ जीवित रहते हैं।
संस्कृति के दीप को जलाए रखने की पुकार
यह आयोजन याद दिलाता है कि जब लोककलाएँ मौन हो जाती हैं, तो संस्कृति सिर्फ इतिहास बनकर रह जाती है।
इन कलाकारों को पहचानना, सम्मान देना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना हमारा सामूहिक कर्तव्य है।
मनोरंजन के आधुनिक शोर में भी, हमारे भीतर लोकधुन की एक धीमी तान अब भी जीवित है — बस उसे सुनने की संवेदना चाहिए।
आभार और नमन
संस्कृति विभाग देहरादून, आयोजक समिति, और सभी सहयोगियों को नमन जिन्होंने इस आयोजन को संभव बनाया।
आपने न केवल एक कार्यक्रम आयोजित किया, बल्कि पहाड़ की आत्मा को पुनर्जीवित किया है।
फोटो कैप्शन:
“72 वर्षीय लोककलाकार श्याम लाल जी नचाढ़ शैली में प्रस्तुति देते हुए, देहरादून संस्कृति प्रेक्षागृह में।”
“हास्य कवि किशना बगोट जी और टीम के साथ लोककलाकार — संस्कृति के पुनर्जन्म का क्षण।”
रिपोर्ट : दिनेश पाल सिंह गुसाईं
Udaen News Network | देहरादून
