जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर को प्रदर्शन की कवरेज के दौरान दुर्व्यवहार और हिरासत में लेने के आरोप, वरिष्ठ पत्रकारों ने जताई नाराजगी; प्रेस क्लब परिसर के बाहर निकाला शांतिपूर्ण विरोध मार्च

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर हुए विरोध प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का मामला सामने आया है। इस घटना के विरोध में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एकजुटता बैठक में वरिष्ठ और युवा पत्रकारों, फोटो पत्रकारों, समाचार एजेंसियों से जुड़े मीडियाकर्मियों, डिजिटल मीडिया प्रतिनिधियों और स्वतंत्र पत्रकारों ने हिस्सा लिया। बैठक में पत्रकारों की सुरक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता और रिपोर्टिंग के दौरान पुलिस के व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।
यह बैठक प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की अध्यक्ष संगीता बरूआ पिशारोती की ओर से बुलाई गई थी। इसका उद्देश्य प्रदर्शन की कवरेज कर रहे मीडियाकर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार के खिलाफ विरोध दर्ज कराना और पत्रकार समुदाय के बीच एकजुटता प्रदर्शित करना था।
पत्रकारों ने सुनाई आपबीती, हिरासत में लेने के आरोप
बैठक में शामिल कई वरिष्ठ और युवा पत्रकारों ने 10 अक्टूबर को कवरेज के दौरान अपने साथ हुए कथित दुर्व्यवहार के अनुभव साझा किए। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस के जवानों ने पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार किया, उन्हें हिरासत में लेकर बसों में बैठाया और उनके पेशेवर दायित्वों के निर्वहन में बाधा पहुंचाई।
पत्रकारों का कहना था कि वे विरोध प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करने के लिए मौके पर मौजूद थे, लेकिन उन्हें अपना काम करने से रोका गया। कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि पुलिस की कार्रवाई के दौरान उनके साथ धक्का-मुक्की की गई और उन्हें अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
बैठक में वक्ताओं ने सोशल मीडिया पर प्रसारित उन वीडियो का भी उल्लेख किया, जिनमें कथित तौर पर महिला पत्रकारों को खींचते, धक्का देते और बसों में बैठाते हुए देखा जा सकता है। पत्रकारों ने इस तरह के व्यवहार की निंदा करते हुए निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग उठाई।
महिला पत्रकार के यौन उत्पीड़न के आरोप पर भी चिंता
बैठक के दौरान रोजी नाम की एक महिला पत्रकार से जुड़े कथित यौन उत्पीड़न के मामले का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं के अनुसार, संबंधित पत्रकार ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन की कवरेज के दौरान उनके साथ यौन उत्पीड़न किया गया और शिकायत दर्ज कराने के लिए उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ा।
इस मामले को लेकर पत्रकारों ने चिंता जताई और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया में आने वाली कथित बाधाओं पर सवाल उठाए।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना आवश्यक है। मामले की निष्पक्ष जांच और शिकायतकर्ता को न्याय दिलाने के लिए उचित कार्रवाई की मांग बैठक में उठाए गए प्रमुख मुद्दों में शामिल रही।
71 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने भी साझा किया अनुभव
बैठक में 71 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने भी अपने साथ हुए कथित दुर्व्यवहार का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उन्हें धक्का दिया गया और हिरासत में लिया गया।
बैठक में न्यूज़लॉन्ड्री, द क्विंट, द वायर, बीबीसी, रेड माइक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों और डिजिटल मंचों से जुड़े पत्रकारों ने अपनी बात रखी। महिला और पुरुष पत्रकारों ने एक स्वर में कहा कि रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए और उन्हें बिना किसी अनुचित बाधा के अपना पेशेवर काम करने का अवसर मिलना चाहिए।
कई पत्रकारों ने कहा कि अपने लंबे पेशेवर जीवन में उन्होंने पुलिस के व्यवहार का ऐसा अनुभव पहले नहीं किया था। उनके अनुसार, पत्रकारों का काम घटनाओं को जनता के सामने लाना है और इस दायित्व के निर्वहन के दौरान उनके साथ दुर्व्यवहार होना प्रेस की स्वतंत्रता के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
वरिष्ठ पत्रकारों ने पुलिस की भूमिका और राजनीतिक जवाबदेही पर उठाए सवाल
बैठक में वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवासन जैन, सतीश जैकब, राजदीप सरदेसाई, द वायर के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन, अजीत अंजुम और सुहासिनी हैदर सहित अन्य पत्रकारों ने पुलिस के कथित व्यवहार की आलोचना की।
वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वतंत्र पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। कुछ वक्ताओं ने आरोप लगाया कि ऐसी कार्रवाई के पीछे राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका और जवाबदेही की भी जांच होनी चाहिए।
बैठक में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा कि पुलिस और प्रशासन को पत्रकारों के काम में अनावश्यक बाधा डालने के बजाय उनकी सुरक्षा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, यदि किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ दुर्व्यवहार के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच कर जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
बैठक के बाद निकाला शांतिपूर्ण विरोध मार्च
बैठक समाप्त होने के बाद पत्रकारों ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया परिसर के बाहर शांतिपूर्ण विरोध मार्च निकाला। इस दौरान पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार के खिलाफ नाराजगी जताई गई और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने की मांग की गई।
प्रदर्शन में शामिल पत्रकारों का कहना था कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका केवल घटनाओं की जानकारी देना नहीं, बल्कि सत्ता और प्रशासन से जवाबदेही सुनिश्चित करना भी है। ऐसे में पत्रकारों को उनके पेशेवर दायित्वों के निर्वहन के दौरान सुरक्षित माहौल मिलना जरूरी है।
पीआईबी कार्ड और डिजिटल मीडिया के साथ व्यवहार पर भी चर्चा
एकजुटता बैठक में पत्रकारों के लिए अनिवार्य पीआईबी कार्ड और पारंपरिक मीडिया तथा डिजिटल मीडिया के बीच बढ़ते विभाजन का मुद्दा भी उठा।
वक्ताओं ने चिंता जताई कि पत्रकारिता के बदलते स्वरूप के बावजूद मीडिया संस्थानों और पत्रकारों के बीच मान्यता तथा सुविधाओं को लेकर भेदभाव की स्थिति पैदा हो रही है। बैठक में कहा गया कि समाचार एजेंसियों, स्वतंत्र पत्रकारों, फोटो पत्रकारों और डिजिटल मीडिया से जुड़े लोगों की भूमिका भी समाचार संकलन और जनहित के मुद्दों को सामने लाने में महत्वपूर्ण है।
वक्ताओं ने यह भी कहा कि मीडिया समुदाय के भीतर विभाजन से पत्रकारों की सामूहिक आवाज कमजोर हो सकती है। ऐसे समय में पत्रकार संगठनों और विभिन्न मीडिया मंचों के बीच सहयोग तथा एकजुटता की जरूरत है।
प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा पर फिर बहस
दिल्ली में हुई इस बैठक ने एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही और स्वतंत्र पत्रकारिता के अधिकारों पर बहस तेज कर दी है।
पत्रकारों का कहना है कि किसी भी प्रदर्शन की कवरेज के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन इस प्रक्रिया में पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार, अनावश्यक हिरासत या रिपोर्टिंग में बाधा के आरोप गंभीरता से लिए जाने चाहिए।
लोकतंत्र में पत्रकारों की भूमिका केवल घटनाओं को दर्ज करना नहीं, बल्कि नागरिकों तक तथ्य पहुंचाना भी है। इसलिए पत्रकारों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार के आरोपों की निष्पक्ष जांच, संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही और मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा इस पूरे मामले के महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
