धैर्य पत्रकारिता का गुण है, लेकिन डर उसकी पहचान नहीं हो सकता
संपादकीय | Udaen News Network
पत्रकारिता का सबसे बड़ा हथियार कैमरा, माइक्रोफोन या मोबाइल फोन नहीं है। उसका सबसे बड़ा हथियार है—सवाल।
लेकिन सवाल पूछने से पहले पत्रकार को धैर्य रखना पड़ता है। तथ्य जुटाने पड़ते हैं। दस्तावेज देखने पड़ते हैं। संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया लेनी पड़ती है। आरोप और प्रमाण के बीच अंतर समझना पड़ता है।
यही जिम्मेदार पत्रकारिता है।
लेकिन इसके बाद एक दूसरा सवाल खड़ा होता है—
अगर सारे तथ्य सामने आने के बाद भी पत्रकार सवाल न पूछे तो?
अगर किसी सरकारी परियोजना में गड़बड़ी के दस्तावेज सामने हों, लेकिन पत्रकार विज्ञापन के दबाव में चुप रहे?
अगर किसी गरीब की जमीन या दुकान पर कार्रवाई हो रही हो, लेकिन पत्रकार इसलिए खबर न करे क्योंकि स्थानीय सत्ता नाराज हो जाएगी?
अगर किसी विभाग में अनियमितता की शिकायत बार-बार सामने आ रही हो, लेकिन पत्रकार केवल प्रेस रिलीज प्रकाशित करता रहे?
अगर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ गंभीर तथ्य हों, लेकिन उसकी राजनीतिक या आर्थिक ताकत देखकर खबर दबा दी जाए?
तब सवाल केवल उस घटना का नहीं रहता।
सवाल पत्रकारिता की स्वतंत्रता का हो जाता है।
RTI पत्रकार का हथियार है, हथियार का विकल्प नहीं
आज पत्रकारिता को केवल बयान आधारित पत्रकारिता से आगे बढ़ना होगा।
“अधिकारी ने कहा…”
“नेता ने आरोप लगाया…”
“विभाग ने बताया…”
ये सूचनाएं खबर का हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन पूरी पत्रकारिता नहीं।
एक पत्रकार को पूछना चाहिए—
दस्तावेज क्या कहते हैं?
यहीं सूचना का अधिकार कानून पत्रकार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण बनता है।
सरकारी फाइल, स्वीकृति आदेश, टेंडर, भुगतान विवरण, कार्यादेश, निरीक्षण रिपोर्ट, बैठक की कार्यवाही, ऑडिट रिपोर्ट और विभागीय पत्राचार—ये सभी किसी कहानी को आरोप से तथ्य की दिशा में ले जा सकते हैं।
एक जिम्मेदार खोजी पत्रकारिता का मॉडल इसलिए सरल हो सकता है—
शिकायत → RTI → दस्तावेज → सत्यापन → संबंधित पक्ष की प्रतिक्रिया → विशेषज्ञ की राय → सार्वजनिक हित का विश्लेषण → खबर।
यह प्रक्रिया पत्रकारिता को अधिक मजबूत बनाती है।
और यही वह जगह है जहां पत्रकार का धैर्य उसकी ताकत बनता है, कमजोरी नहीं।
प्रेस विज्ञप्ति पत्रकारिता से आगे बढ़ना होगा
आज डिजिटल दौर में सूचना की कमी नहीं है।
सरकार के पास प्रेस रिलीज है।
राजनीतिक दलों के पास सोशल मीडिया है।
कंपनियों के पास PR एजेंसियां हैं।
अधिकारी अपने सोशल मीडिया अकाउंट से सीधे जनता तक पहुंच रहे हैं।
तो फिर पत्रकार की जरूरत क्या है?
जरूरत है उस सवाल की, जो प्रेस रिलीज में नहीं लिखा होता।
सरकार कहती है—योजना सफल है।
पत्रकार को पूछना चाहिए—
कितने लोगों को लाभ मिला?
कितना पैसा खर्च हुआ?
लाभार्थियों का चयन कैसे हुआ?
परिणाम का स्वतंत्र मूल्यांकन हुआ या नहीं?
सरकार कहती है—सड़क बन गई।
पत्रकार को पूछना चाहिए—
गुणवत्ता कैसी है?
कितनी लागत आई?
किस एजेंसी ने काम किया?
रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है?
सरकार कहती है—अतिक्रमण हटाया गया।
पत्रकार को पूछना चाहिए—
क्या सभी पर समान कार्रवाई हुई?
नोटिस की प्रक्रिया क्या थी?
प्रभावित लोगों को सुनवाई का अवसर मिला?
क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई?
यही पत्रकार और प्रचारक के बीच का अंतर है।
विज्ञापन बनाम संपादकीय स्वतंत्रता
मीडिया संस्थानों के सामने आर्थिक संकट वास्तविक है।
अखबार चलाने के लिए पैसा चाहिए।
न्यूज पोर्टल चलाने के लिए तकनीक और कर्मचारी चाहिए।
रिपोर्टर को संसाधन चाहिए।
फील्ड रिपोर्टिंग में यात्रा और समय लगता है।
लेकिन आर्थिक आवश्यकता और संपादकीय स्वतंत्रता के बीच एक स्पष्ट सीमा होनी चाहिए।
विज्ञापनदाता खबर का संपादक नहीं हो सकता।
यदि किसी संस्थान का विज्ञापन बंद होने के डर से उसकी आलोचनात्मक खबर रोक दी जाती है, तो नुकसान केवल उस खबर का नहीं होता।
नुकसान जनता के सूचना के अधिकार का होता है।
इसी तरह यदि किसी राजनीतिक दल या सरकार से निकटता के कारण सकारात्मक खबरें प्राथमिकता पाने लगें और आलोचनात्मक खबरें गायब होने लगें, तो पाठक को यह समझने का अधिकार है कि वह पत्रकारिता पढ़ रहा है या जनसंपर्क सामग्री।
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की पत्रकारिता संबंधी मानक व्यवस्था सटीकता, निष्पक्षता और जिम्मेदारी पर जोर देती है तथा गलत, भ्रामक या विकृत सामग्री से बचने की अपेक्षा करती है।
इसका अर्थ यह भी है कि संपादकीय स्वतंत्रता केवल संस्थान का दावा नहीं, उसकी रोजमर्रा की कार्यप्रणाली में दिखाई देने वाली चीज होनी चाहिए।
लेकिन खोजी पत्रकारिता का अर्थ किसी को बदनाम करना नहीं
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है।
सत्ता से सवाल पूछने का मतलब यह नहीं कि पत्रकार किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित कर दे।
खोजी पत्रकारिता में भी कानून, नैतिकता और तथ्य की सीमाएं हैं।
आरोप को तथ्य की तरह नहीं लिखा जा सकता।
शक को प्रमाण नहीं बनाया जा सकता।
अफवाह को खबर नहीं बनाया जा सकता।
जिस व्यक्ति या संस्था पर गंभीर आरोप हों, उसका पक्ष लेना पत्रकारिता की मजबूरी नहीं, बल्कि निष्पक्षता की बुनियादी आवश्यकता है।
प्रेस काउंसिल के मानदंड भी सटीकता और निष्पक्षता को पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं।
इसलिए मजबूत पत्रकारिता का सूत्र यह नहीं है—
“पहले प्रकाशित करो, बाद में जांच करो।”
बल्कि—
“पहले जांच करो, फिर प्रकाशित करो।”
लेकिन जांच पूरी होने के बाद भी अगर केवल डर के कारण खबर रोक दी जाए, तो वह दूसरी समस्या है।
पत्रकार सुरक्षा केवल व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं
एक पत्रकार को धमकी मिलती है तो अक्सर इसे व्यक्तिगत मामला मान लिया जाता है।
लेकिन यदि किसी पत्रकार को इसलिए धमकाया जा रहा है क्योंकि उसने सार्वजनिक हित का सवाल उठाया, तो यह केवल एक व्यक्ति पर दबाव नहीं है।
यह सूचना के सार्वजनिक अधिकार पर दबाव है।
पत्रकार की सुरक्षा में केवल शारीरिक सुरक्षा शामिल नहीं होनी चाहिए।
इसमें शामिल होना चाहिए—
- डिजिटल सुरक्षा
- स्रोतों की सुरक्षा
- दस्तावेजों की सुरक्षित व्यवस्था
- कानूनी सहायता
- मानहानि और अन्य कानूनी नोटिसों से निपटने की संस्थागत व्यवस्था
- फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल
- धमकी या हमले की स्थिति में त्वरित शिकायत व्यवस्था
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने समय-समय पर पत्रकारों पर हमलों और पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर संज्ञान लिया है।
इससे स्पष्ट है कि पत्रकार सुरक्षा का प्रश्न केवल व्यक्तिगत बहादुरी पर नहीं छोड़ा जा सकता।
उत्तराखंड में पत्रकारिता को जमीन पर लौटना होगा
उत्तराखंड की पत्रकारिता के सामने चुनौतियां अलग प्रकृति की हैं।
पहाड़ में पलायन है।
बंद होते स्कूल हैं।
स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष है।
सड़क और संचार की समस्याएं हैं।
आपदाओं का बढ़ता जोखिम है।
अनियोजित शहरीकरण है।
भूमि और आजीविका के सवाल हैं।
इन मुद्दों पर केवल देहरादून के प्रेस नोट से पत्रकारिता नहीं हो सकती।
पत्रकार को गांव तक जाना होगा।
लाभार्थी से मिलना होगा।
फाइल देखनी होगी।
स्थल निरीक्षण करना होगा।
सरकारी आंकड़ों को जमीन के आंकड़ों से मिलाना होगा।
और सबसे महत्वपूर्ण—
जिसकी आवाज सबसे कमजोर है, उसकी बात सुननी होगी।
यही लोकतांत्रिक पत्रकारिता है।
मौन कब अपराध नहीं, लेकिन कब सवाल बन जाता है?
हर चुप्पी गलत नहीं होती।
कभी तथ्य अधूरे होते हैं।
कभी जांच जारी होती है।
कभी किसी की निजी जानकारी प्रकाशित करना उचित नहीं होता।
कभी कानून रिपोर्टिंग की सीमा तय करता है।
कभी पत्रकार को अपनी और अपने स्रोत की सुरक्षा के लिए सावधानी बरतनी पड़ती है।
लेकिन जब—
तथ्य उपलब्ध हों,
सार्वजनिक हित स्पष्ट हो,
सभी पक्षों से प्रतिक्रिया ली जा चुकी हो,
दस्तावेजों की पुष्टि हो चुकी हो,
और फिर भी केवल दबाव के कारण पत्रकार चुप हो जाए—
तो वहां सवाल उठना चाहिए।
यहीं “Silence is Acquiescence” एक चेतावनी बन जाता है।
पत्रकार को न सत्ता का दुश्मन बनना है, न उसका प्रवक्ता
पत्रकारिता का सबसे स्वस्थ स्थान सत्ता और विपक्ष के बीच नहीं, जनता के बीच है।
सरकार अच्छा काम करे तो उसकी खबर होनी चाहिए।
सरकार गलत करे तो सवाल होना चाहिए।
विपक्ष तथ्यपूर्ण मुद्दा उठाए तो उसे जगह मिलनी चाहिए।
विपक्ष गलत सूचना फैलाए तो उसका भी तथ्यात्मक खंडन होना चाहिए।
अधिकारी सही निर्णय ले तो उसका उल्लेख होना चाहिए।
अधिकारी गलत निर्णय ले तो उससे जवाब मांगा जाना चाहिए।
यही संतुलन है।
न सरकार की अंधभक्ति।
न विपक्ष की अंधभक्ति।
न व्यक्ति पूजा।
न व्यक्ति विरोध।
केवल तथ्य, कानून और सार्वजनिक हित।
और अंत में—कलम किसके लिए है?
पत्रकार के पास सत्ता नहीं होती।
उसके पास पुलिस नहीं होती।
उसके पास प्रशासनिक अधिकार नहीं होता।
उसके पास बजट नहीं होता।
उसके पास केवल एक चीज होती है—
सवाल पूछने का अधिकार और जनता तक तथ्य पहुंचाने की जिम्मेदारी।
इसलिए पत्रकार को धैर्यवान होना चाहिए, लेकिन डरपोक नहीं।
उसे विनम्र होना चाहिए, लेकिन सत्ता के सामने नतमस्तक नहीं।
उसे निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन सत्य के प्रति उदासीन नहीं।
उसे कानून का सम्मान करना चाहिए, लेकिन कानून और अधिकारों के सवाल पूछने से डरना नहीं चाहिए।
क्योंकि—
धैर्य खबर को मजबूत करता है।
तथ्य खबर को विश्वसनीय बनाते हैं।
साहस खबर को अर्थ देता है।
और स्वतंत्रता पत्रकारिता को पत्रकारिता बनाए रखती है।
इसलिए अगली बार जब कोई पत्रकार किसी गलत चीज को देखकर चुप रहने का फैसला करे, तो उसे खुद से एक सवाल पूछना चाहिए—
“मैं चुप इसलिए हूं क्योंकि मेरे पास पर्याप्त तथ्य नहीं हैं, या इसलिए क्योंकि मेरे पास पर्याप्त साहस नहीं है?”
दोनों के बीच का अंतर ही तय करेगा कि हम किस तरह की पत्रकारिता कर रहे हैं।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक पत्रकार वह नहीं जो सवाल पूछता है।
सबसे खतरनाक स्थिति वह है जब पत्रकार के पास सवाल हों—और वह उन्हें पूछना छोड़ दे।
Udaen News Network
सत्य • जवाबदेही • सार्वजनिक हित
