राजीव गांधी : 21वीं सदी के भारत का सपना देखने वाला नेता
21 मई 1991 को श्रीपेरंबदूर में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे दर्दनाक और निर्णायक घटनाओं में गिनी जाती है। तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राजीव गांधी का व्यक्तित्व, उनकी राजनीति और उनकी दूरदृष्टि भारतीय जनमानस में लगातार चर्चा, स्मृति और बहस का विषय बनी हुई है।
राजीव गांधी मूलतः पेशे से एक पायलट थे और सक्रिय राजनीति में आने की उनकी प्रारंभिक इच्छा नहीं थी। लेकिन संजय गांधी की मृत्यु और बाद में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद परिस्थितियों ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। मात्र 40 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी उस दौर में देश का नेतृत्व संभाल रहे थे जब भारत प्रशासनिक जड़ता, तकनीकी पिछड़ेपन और पुरानी आर्थिक सोच से जूझ रहा था।
राजीव गांधी ने भारतीय राजनीति में आधुनिकता की भाषा को स्थापित करने का प्रयास किया। जिस समय कंप्यूटर और तकनीकी बदलाव को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था, उस समय उन्होंने भारत को 21वीं सदी में ले जाने की बात कही। आज डिजिटल इंडिया, सूचना प्रौद्योगिकी, मोबाइल क्रांति और इंटरनेट आधारित अर्थव्यवस्था जिस रूप में दिखाई देती है, उसकी शुरुआती वैचारिक और नीतिगत नींव राजीव गांधी के दौर में ही रखी गई थी।
टेलीकॉम क्षेत्र का विस्तार, कंप्यूटराइजेशन को बढ़ावा, वैज्ञानिक सोच पर बल और युवाओं को नई तकनीक से जोड़ने का प्रयास राजीव गांधी की राजनीति की पहचान बना। उन्होंने यह समझ लिया था कि आने वाला भारत केवल पारंपरिक राजनीति से नहीं, बल्कि ज्ञान, तकनीक और सूचना से संचालित होगा।
राजीव गांधी ने लोकतंत्र को गांवों तक मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल की। पंचायती राज व्यवस्था को सशक्त बनाने का उनका विचार इस सोच से जुड़ा था कि लोकतंत्र केवल दिल्ली और राज्यों की राजधानियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि गांवों और स्थानीय निकायों तक उसकी वास्तविक शक्ति पहुंचनी चाहिए।
हालांकि उनका राजनीतिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा। बोफोर्स मामले ने उनकी साफ-सुथरी छवि को गहरा आघात पहुंचाया। 1980 के दशक के कुछ राजनीतिक और सांप्रदायिक घटनाक्रमों को लेकर भी उनके फैसलों की आलोचना होती रही है। यही कारण है कि राजीव गांधी की विरासत को केवल एक आयाम में नहीं देखा जा सकता। वह आधुनिक सोच, राजनीतिक अनुभवहीनता, सुधारवादी दृष्टिकोण और सत्ता की जटिलताओं का मिश्रण थे।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि राजीव गांधी ने भारतीय राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने उस भारत की कल्पना की थी जो युवा, तकनीकी रूप से सक्षम, वैश्विक दृष्टि वाला और आधुनिक प्रशासनिक ढांचे से लैस हो।
21 मई 1991 को चुनाव प्रचार के दौरान हुई उनकी हत्या केवल एक नेता की हत्या नहीं थी, बल्कि भारत के राजनीतिक संक्रमण पर एक हिंसक प्रहार था। श्रीपेरंबदूर का विस्फोट पूरे देश को स्तब्ध कर गया और भारतीय लोकतंत्र को यह एहसास दिला गया कि आतंकवाद और उग्रवाद किस तरह राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
आज उनकी पुण्यतिथि पर राजीव गांधी को याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस दौर को समझना भी है जब भारत आधुनिकता की ओर अपने बड़े कदम बढ़ा रहा था। इतिहास उनकी उपलब्धियों और गलतियों दोनों का मूल्यांकन करता रहेगा, लेकिन यह तथ्य अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक और तकनीकी भारत की परिकल्पना को राजनीतिक रूप देने वालों में राजीव गांधी का नाम प्रमुखता से दर्ज है।
