संपादकीय : दिनेश गुसाईं UNN
उत्तराखंड के पहाड़ों में रहने वाले लोग: हक़, हकीकत और हाशिये की ज़िंदगी
उत्तराखंड के पहाड़ दूर से जितने सुंदर दिखते हैं, भीतर से उतने ही संघर्षग्रस्त हैं। यहाँ रहने वाले लोग प्रकृति के सबसे नज़दीक हैं, पर नीतियों से सबसे दूर। विकास के नक़्शों में पहाड़ दिखाई देते हैं, लेकिन पहाड़ों के लोग अक्सर फुटनोट बनकर रह जाते हैं। जबकि संविधान——कहता है कि शासन का केंद्र नागरिक है, न कि परियोजनाएँ।
रोज़गार पहाड़ों की सबसे बड़ी चिंता है। खेत छोटे हैं, मौसम अनिश्चित है, और स्थानीय उद्योग सीमित। नतीजा—पलायन। गाँव खाली होते जा रहे हैं; स्कूल, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य उपकेंद्र काग़ज़ों में चल रहे हैं। जो रुकते हैं, वे बुज़ुर्ग, महिलाएँ और बच्चे—जिन्हें हर आपदा का पहला झटका झेलना पड़ता है।
ज़मीन यहाँ केवल संपत्ति नहीं, पहचान है। पर सड़क, सुरंग, बांध और टूरिज़्म परियोजनाओं के बीच स्थानीय सहमति अक्सर औपचारिकता बन जाती है। मुआवज़ा बाज़ार के हिसाब से होता है, पहाड़ के हिसाब से नहीं। नतीजा—आजीविका टूटती है, संस्कृति बिखरती है।
जंगल कभी आजीविका और संरक्षण का साझा आधार थे। आज “संरक्षण” की भाषा में स्थानीय अधिकार सिकुड़ते हैं। ईंधन, चारा, लघु वनोपज—सब पर नियम बढ़ते गए, संवाद घटता गया। जबकि पहाड़ ने सिखाया है कि जंगल बिना लोगों के नहीं बचते।
पानी उत्तराखंड की आत्मा है—नौले, धाराएँ, गधेरे। पर जलस्रोत सूख रहे हैं, नदियाँ सुरंगों में कैद हैं, और पीने का पानी टैंकरों पर टिका है। पहाड़ में पानी का संकट केवल संसाधन का नहीं, प्रबंधन के केंद्रीकरण का भी है।
आपदाएँ—भूस्खलन, बाढ़, बादल फटना—अब अपवाद नहीं रुटीन हैं। चेतावनी प्रणालियाँ और पुनर्वास योजनाएँ हैं, पर ज़मीनी अमल कमजोर। हर आपदा के बाद पहाड़ वही सवाल पूछते हैं: क्या हमने प्रकृति की सीमा समझी?
लोकतांत्रिक आवाज़ मौजूद है, पर सुनी कम जाती है। ग्राम सभाएँ, स्थानीय निकाय—कानून में शक्तिशाली, व्यवहार में कमजोर। नीति ऊपर बनती है, असर नीचे पड़ता है
उत्तराखंड के पहाड़ों में रहने वाले लोग विकास के विरोधी नहीं; वे न्यायपूर्ण, स्थानीय और टिकाऊ विकास चाहते हैं। ज़मीन पर हक़, जंगल में साझेदारी, पानी पर समुदाय का नियंत्रण, रोज़गार का स्थानीय आधार—यही रास्ता है। सरकार का काम ट्रस्टशिप निभाना है; लोगों का अधिकार है सहमति देना, सवाल करना और दिशा तय करना।
पहाड़ बचेंगे तो लोग बचेंगे—और लोग बचेंगे तो ही पहाड़। यही उत्तराखंड की वास्तविक स्थिति और भविष्य की कुंजी है।
