जहां एक ओर प्राकृतिक आपदाएं लोगों के घर-आंगन उजाड़ रही हैं, वहीं पंचायत चुनावों में धनबल और बाहुबल लोकतंत्र की जड़ों को हिला रहे हैं।
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धराली सहित उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में हाल की प्राकृतिक आपदाओं ने एक बार फिर पर्वतीय जीवन की नाजुकता और चुनौतियों को उजागर कर दिया है। बारिश और भू-स्खलन ने गांवों को तबाह कर दिया, रास्ते टूट गए और लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी संकट में आ गए।
लेकिन इसी बीच राज्य के कई हिस्सों में पंचायत चुनावों की हलचल भी जारी है। लोकतंत्र के इस “त्यौहार” में जहां जनता को अपनी भागीदारी और नेतृत्व चुनने का अधिकार मिलना चाहिए था, वहां धनबल और बाहुबल का बोलबाला दिखाई दिया। सवाल यह उठता है कि आपदा और विपदा के इस दोहरे संकट में असली नुकसान किसका हो रहा है और फायदा किसे मिल रहा है?
सामाजिक कार्यकर्ताओं और जानकारों का मानना है कि प्राकृतिक आपदाएं आम जनता की कमर तोड़ देती हैं, जबकि राजनीति में यह समय कुछ लोगों के लिए अवसर बन जाता है। राहत और पुनर्वास की राजनीति, चुनावी रैलियां और सत्ता की जंग—ये सब मिलकर राज्य की सामाजिक बुनियाद को झकझोर रहे हैं।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी राज्य में यह बेहद जरूरी हो जाता है कि आपदा प्रबंधन और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ें। वरना, बार-बार आपदाओं और राजनीतिक विपदाओं के बीच आम जनता ही सबसे बड़ा शिकार बनती रहेगी।
👉 असली सवाल यही है:
क्या उत्तराखंड के लोकतंत्र को आपदाओं से जूझते हुए और विपदा के बीच जीते हुए जनता के भरोसेमंद नेताओं की जरूरत नहीं है?
