13 अगस्त फ़िदेलकास्त्रो के 98वें जन्मदिन पर विशेष।
1952 में बतिस्ता की तानाशाही सत्ता के ख़िलाफ़ हथियार उठाकर, 26 जुलाई 1953 को फ़िदेल और उनके 160 साथियों ने सैंटियागो के मोंकड्डो सैन्य ठिकाने पर हमला किया। यह हमला तत्कालीन सैन्य ताक़त से हार गया, कई साथी शहीद हुए, दर्जनों पकड़े गए और मार दिए गए।
लेकिन अदालत में फ़िदेल ने भगत सिंह की तरह मुकदमे को जनता तक अपनी आवाज़ पहुँचाने का मंच बना दिया। उन्होंने कहा —
“मैं अपने लिए रिहाई नहीं माँगता, मुझे वहीं भेज दो जहाँ मेरे बाकी साथी हैं।”
15 साल की सज़ा सुनाई गई, पर जनता ने 22 महीने में ही उन्हें जेल से छुड़ा लिया।
1956 में चे ग्वेरा के साथ वापसी।
1959 में तानाशाह गिरा, क्यूबा आज़ाद हुआ।
फ़िदेल ने सैंटियागो में जाकर उसी बैरक की क़िलेबंदी तोड़ दी और उसे स्कूल व संग्रहालय में बदल दिया।
अमेरिका की लाख कोशिशें भी नाकाम
CIA ने उनकी हत्या के 600 से अधिक प्रयास किए, लेकिन फ़िदेल 9 अमेरिकी राष्ट्रपतियों के कार्यकाल देख कर ही दुनिया से विदा हुए। 1990 से पहले ही उन्होंने अमेरिका को मात देकर दुनिया के लगभग सभी देशों से राजनयिक मान्यता हासिल कर ली। 2015 में बराक ओबामा भी क्यूबा आकर संबंध बहाल करने को मजबूर हुए।
क्यूबा — शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव विकास में यूरोप के बराबर
अमेरिकी आर्थिक नाकेबंदी के बावजूद, क्यूबा ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐसे मानक बनाए कि वह अमेरिका से भी बेहतर मानव विकास सूचकांक तक पहुंच गया।
फ़िदेल का सपना, क्यूबा की जिद — आज भी ज़िंदा है।
जीत तक, हमेशा। ✊
