कोटद्वार: नौ माह बाद भी पोस्टमार्टम हाउस के जीर्णोद्धार कार्य की शुरुआत नहीं, 37 लाख की योजना अधर में
कोटद्वार।
कोटद्वार के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की जो उम्मीदें वर्ष 2024-25 में मिलीं थीं, वे नौ महीने बीतने के बावजूद अब तक धरातल पर नहीं उतर सकीं हैं। 11 अक्तूबर 2024 को तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान द्वारा स्वीकृत पोस्टमार्टम हाउस जीर्णोद्धार योजना पर 37.27 लाख रुपये का बजट खनिज न्यास निधि से जारी हुआ था, लेकिन अब तक एक कील तक नहीं लगी है।
काम का जिम्मा, लेकिन नतीजा शून्य
इस परियोजना को उत्तराखंड प्रदेश ग्रामीण निर्माण विभाग (RWD), प्रखंड कोटद्वार को सौंपा गया था। कार्य में चिकित्सक कक्ष, पोस्टमार्टम कक्ष, प्रतीक्षालय और दो विसरा कक्षों के जीर्णोद्धार के साथ-साथ करीब दो लाख रुपये के आधुनिक विद्युत उपकरणों की स्थापना भी प्रस्तावित है, जिससे शव परीक्षण की प्रक्रिया तेज और सुरक्षित हो सके।
लेकिन बेस अस्पताल प्रशासन और आरडब्ल्यूडी के बीच समन्वय की कमी, और विसरा व अन्य सामग्री के सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरण में बाधाएं बनने के चलते कार्य अब तक प्रारंभ नहीं हो पाया है।
क्या है बाधा?
- अस्थायी पोस्टमार्टम व्यवस्था और विसरा रखने के लिए पुलिस संरक्षण की आवश्यकता जताई गई थी।
- पुलिस प्रशासन ने स्थान की अनुपलब्धता और कोटद्वार के विसरा का वहां न होना कारण बताकर व्यवस्था से इंकार कर दिया।
- आरडब्ल्यूडी के सहायक अभियंता संजीव वर्मा के अनुसार, जब तक पोस्टमार्टम हाउस का सामान शिफ्ट नहीं किया जाता, तब तक निर्माण कार्य संभव नहीं।
“बेस अस्पताल प्रशासन से कई बार संपर्क किया गया है, लेकिन विसरा व सामान की शिफ्टिंग के बिना कार्य शुरू नहीं हो सकता।”
– संजीव वर्मा, सहायक अभियंता, आरडब्ल्यूडी, कोटद्वार
वहीं प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विजय सिंह ने कहा कि
“विसरा आदि को शिफ्ट करने के लिए मुक्ति बोध धाम (श्मशानघाट) प्रबंध समिति से बातचीत चल रही है, जल्द ही स्थान मिलने की उम्मीद है।”
प्रश्न उठते हैं:
- नौ महीने तक संवाद और समन्वय क्यों नहीं हो सका?
- जब बजट स्वीकृत और संस्था नियुक्त हो चुकी थी, तो प्रशासनिक बैठकें क्यों नहीं बुलाई गईं?
- स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था जैसे संवेदनशील विषय पर इस तरह की शिथिलता कौन जिम्मेदार है?
जनता में आक्रोश, पारदर्शिता की मांग
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने इस देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है। पोस्टमार्टम जैसी संवेदनशील प्रक्रिया की अव्यवस्था न केवल पीड़ित परिवारों के लिए मानसिक यातना है, बल्कि यह शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाती है।
समाधान क्या हो?
- प्रशासन को चाहिए कि आपात बैठक बुलाकर समन्वय स्थापित करे।
- स्थायी और अस्थायी दोनों व्यवस्थाओं पर त्वरित निर्णय लिया जाए।
- यदि कोई संस्था कार्य में देरी कर रही है, तो वैकल्पिक एजेंसी को जिम्मेदारी दी जाए।
निष्कर्ष:
कोटद्वार जैसे संवेदनशील क्षेत्र में, जहां बढ़ती आबादी और दुर्घटनाएं पहले से ही तनाव का कारण हैं, वहां पोस्टमार्टम हाउस जैसी सुविधा का लटक जाना एक आपराधिक लापरवाही के रूप में देखा जाना चाहिए। यह समय है, जब जनता को जवाब चाहिए—सिर्फ वादे नहीं, काम के साक्ष्य भी चाहिए।
