राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 27 सितंबर 1925 को केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। इस दृष्टि से, आरएसएस का शताब्दी वर्ष 2025 में मनाया जाएगा।
आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विभिन्न कार्यक्रमों और अभियानों की योजना बनाई जा रही है, जिनमें **राष्ट्रवाद, सामाजिक सेवा, हिंदुत्व विचारधारा के प्रचार, और संगठन विस्तार** से जुड़े कार्य शामिल हो सकते हैं। शताब्दी वर्ष को व्यापक रूप से मनाने के लिए पूरे भारत में शाखाओं की संख्या बढ़ाने, समाज सेवा के नए प्रकल्प शुरू करने और सार्वजनिक कार्यक्रमों के आयोजन की संभावना है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने पर 2025 में शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस अवसर पर संघ ने ‘पंच परिवर्तन’ के पांच प्रमुख विषयों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है:
1. **सामाजिक समरसता**: समाज में जाति, वर्ग और समुदाय के बीच समरसता स्थापित करना, जिससे अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों का उन्मूलन हो सके।
2. **कुटुम्ब प्रबोधन**: परिवार को समाज की मूल इकाई मानते हुए, परिवारिक मूल्यों का संवर्धन और संरक्षण करना।
3. **पर्यावरण संरक्षण**: प्रकृति की रक्षा हेतु जल संरक्षण, वृक्षारोपण और प्लास्टिक मुक्त वातावरण के लिए जागरूकता फैलाना।
4. **स्वदेशी**: स्थानीय उत्पादों और सेवाओं को प्रोत्साहित कर आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
5. **नागरिक कर्तव्य**: प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना, जिससे राष्ट्र निर्माण में सक्रिय सहभागिता हो।
इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए, आरएसएस ने विभिन्न कार्यक्रमों और अभियानों की योजना बनाई है, जो शताब्दी वर्ष के दौरान आयोजित किए जाएंगे। इनमें समाज के सभी वर्गों की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।
शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने संगठन के प्राथमिक लक्ष्य के रूप में अनुशासित और मजबूत हिंदू समाज के निर्माण पर जोर दिया है।
इसके अतिरिक्त, संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक मार्च 2025 में बेंगलुरु में आयोजित की गई, जिसमें शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की समीक्षा और आगामी योजनाओं पर चर्चा की गई।
इन प्रयासों के माध्यम से, आरएसएस अपने शताब्दी वर्ष को समाज में सकारात्मक परिवर्तन और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित कर रहा है।
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सर्वोच्च नीति निर्धारण एवं योजना निर्माण करने वाली सभा है। यह संघ का वार्षिक अधिवेशन होता है, जिसमें संघ के विभिन्न अनुषांगिक संगठनों और शाखाओं की रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है और आगामी वर्ष की योजनाओं पर निर्णय लिए जाते हैं।
### **ABPS की कार्यप्रणाली (Working of ABPS)**
1. **वार्षिक बैठकें**:
– हर वर्ष मार्च महीने में ABPS की बैठक आयोजित की जाती है।
– इसमें संघ के शीर्ष पदाधिकारी, क्षेत्रीय और प्रांतीय प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
– बैठक में बीते वर्ष की गतिविधियों का आकलन और नए कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की जाती है।
2. **महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा**:
– समाज और राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाती है।
– संघ और उसके सहयोगी संगठनों (जैसे विश्व हिंदू परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विद्यार्थी परिषद आदि) की रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है।
– सामाजिक समरसता, पर्यावरण, शिक्षा, ग्रामीण विकास, आत्मनिर्भर भारत, आदि विषयों पर प्रस्ताव पारित किए जाते हैं।
3. **संगठनात्मक विस्तार एवं कार्ययोजना**:
– शाखाओं की संख्या बढ़ाने, नए क्षेत्रों में विस्तार करने और संगठन को और प्रभावी बनाने की योजना बनाई जाती है।
– समाज में स्वयंसेवकों की सहभागिता को बढ़ाने के लिए विशेष अभियानों की रणनीति तय की जाती है।
4. **विशेष अभियानों की घोषणा**:
– विभिन्न अभियानों जैसे पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी जागरण, नागरिक कर्तव्य, कुटुंब प्रबोधन, आदि की योजना बनाई जाती है।
– वर्ष 2025 के शताब्दी समारोह के तहत विशेष कार्यक्रमों की घोषणा की जाती है।
5. **प्रस्ताव पारित करना**:
– राष्ट्रहित और समाजहित से जुड़े प्रस्ताव पारित किए जाते हैं।
– सरकार की नीतियों, सामाजिक मुद्दों और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर संघ का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जाता है।
### **ABPS 2025 का विशेष महत्व**
– 2025 में संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर, ABPS में संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की जा रही है।
– ‘पंच परिवर्तन’ (सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी, नागरिक कर्तव्य) जैसे प्रमुख विषयों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
– संघ के कार्यों को और अधिक व्यापक बनाने तथा समाज में इसकी सकारात्मक भूमिका को मजबूत करने पर बल दिया जा रहा है।
ABPS संघ के नीति निर्माण और भविष्य की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच है, जो संघ के संगठनात्मक कार्यों को दिशा देने के साथ-साथ राष्ट्रहित के विषयों पर भी प्रभावी भूमिका निभाता है।
– **संगठनात्मक निर्णय प्रक्रिया** (कैसे प्रस्ताव पारित होते हैं?)
– **ABPS में संघ की संरचना और भूमिकाएँ** (कौन-कौन इसमें भाग लेता है?)
– **ABPS के प्रमुख प्रस्ताव और उनके प्रभाव**
– **ABPS 2025 के विशेष एजेंडे और योजनाएँ**
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) संगठन की सर्वोच्च निर्णय-निर्माण इकाई है, जो संघ की नीतियों, कार्यक्रमों और भविष्य की योजनाओं को निर्धारित करती है। यह सभा प्रतिवर्ष मार्च महीने में आयोजित की जाती है, जिसमें संघ के विभिन्न स्तरों के प्रतिनिधि भाग लेते हैं।
**ABPS की कार्यप्रणाली:**
1. **प्रतिनिधित्व:**
– ABPS में देशभर से लगभग 1,400 प्रतिनिधि शामिल होते हैं। प्रत्येक प्रांत से लगभग 50 सक्रिय स्वयंसेवकों का प्रतिनिधित्व एक प्रांत प्रतिनिधि द्वारा किया जाता है, जबकि हर 20 प्रांत प्रतिनिधियों का नेतृत्व एक अखिल भारतीय प्रतिनिधि करता है।
2. **सदस्यता:**
– राष्ट्रीय कार्यकारिणी, क्षेत्रीय कार्यकारिणी, प्रांत कार्यकारिणी के सदस्य, प्रतिनिधि सभा के निर्वाचित सदस्य और सभी विभाग प्रचारक इस सभा का हिस्सा होते हैं। इसके अलावा, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP), विश्व हिंदू परिषद (VHP) जैसे संघ के आनुषांगिक संगठनों के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल होते हैं।
3. **बैठक की अवधि और एजेंडा:**
– बैठक आमतौर पर तीन दिनों तक चलती है, जिसमें पिछले वर्ष की गतिविधियों की समीक्षा की जाती है और आगामी वर्ष के लिए कार्ययोजना तैयार की जाती है। इसमें संघ शिक्षा वर्ग (प्रशिक्षण शिविर) की योजना, संगठनात्मक विस्तार, सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा, और प्रस्ताव पारित किए जाते हैं।
4. **प्रस्ताव और निर्णय:**
– ABPS में सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर प्रस्ताव पारित किए जाते हैं, जो संघ की दृष्टिकोण और नीतियों को प्रतिबिंबित करते हैं। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा और बांग्लादेशी घुसपैठ जैसे मुद्दों पर प्रस्ताव लाए जा सकते हैं।
5. **विशेष वर्ष और आयोजन:**
– संघ की स्थापना 1925 में हुई थी, इसलिए 2025 में इसका शताब्दी वर्ष मनाया जाएगा। इस महत्वपूर्ण अवसर के लिए विशेष योजनाएँ और कार्यक्रम ABPS में चर्चा और अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किए जाते हैं।
ABPS संघ की नीतियों और कार्यक्रमों को निर्धारित करने में केंद्रीय भूमिका निभाती है, जिससे संगठनात्मक दिशा और समाज में उसकी भूमिका स्पष्ट होती है।
### **निष्कर्ष (Conclusion)**
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सर्वोच्च निर्णय-निर्माण इकाई है, जो संगठन की नीतियों, योजनाओं और भविष्य की दिशा को निर्धारित करती है। यह हर वर्ष मार्च में आयोजित होती है, जिसमें संघ के विभिन्न स्तरों के प्रतिनिधि भाग लेते हैं और महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर चर्चा कर निर्णय लेते हैं।
ABPS संघ के संगठनात्मक विस्तार, समाजिक सेवा अभियानों, राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रसार, और समाज के समग्र विकास से जुड़े कार्यों को दिशा देती है। विशेष रूप से 2025 में संघ के शताब्दी वर्ष को ध्यान में रखते हुए, इस सभा में संघ के भविष्य के लक्ष्यों और अभियानों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
संक्षेप में, ABPS संघ की विचारधारा और कार्यनीति का केंद्रबिंदु है, जो राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों पर संघ की भूमिका को स्पष्ट करता है और उसके कार्यक्रमों को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने का मार्ग प्रशस्त करता है।
