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करीब एक साल बाद 13 पत्रकार सदस्यों की नियुक्ति, लेकिन प्रेस की स्वतंत्रता और छोटे समाचार-पत्रों के हितों की रक्षा ही होगी असली कसौटी।

प्रेस लोकतंत्र का प्रहरी है। उसकी स्वतंत्रता केवल संविधान में दर्ज एक आदर्श नहीं, बल्कि नागरिकों के सूचना के अधिकार, सरकार की जवाबदेही और लोकतांत्रिक व्यवस्था की पारदर्शिता से जुड़ा प्रश्न है। ऐसे में करीब एक साल बाद भारतीय प्रेस परिषद में 13 पत्रकार सदस्यों की नियुक्ति मीडिया जगत के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। केंद्र सरकार ने छह संपादकों और सात कार्यरत पत्रकारों के नाम अधिसूचित किए हैं। अब अपेक्षा है कि परिषद अपनी संवैधानिक भावना और वैधानिक दायित्वों के अनुरूप सक्रिय भूमिका निभाएगी।

लेकिन सवाल केवल सदस्यों की नियुक्ति का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या नई परिषद उन पत्रकारों और समाचार-पत्रों की आवाज बनेगी, जिनकी समस्याएं अक्सर बड़े मीडिया संस्थानों की चमक के पीछे दब जाती हैं?

छोटे समाचार-पत्रों की समस्याएं कौन उठाएगा?

देश के जिला मुख्यालयों, कस्बों और दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में संचालित छोटे तथा मध्यम समाचार-पत्र लोकतंत्र की जमीनी आवाज हैं। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में स्थानीय पत्रकार सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, वनाधिकार, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को सामने लाते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद ये समाचार-पत्र उन क्षेत्रों तक सूचना पहुंचाते हैं, जहां बड़े मीडिया संस्थानों की नियमित मौजूदगी नहीं होती।

इसके बावजूद छोटे प्रकाशनों को आर्थिक संकट, समाचार-पत्र वितरण की बढ़ती लागत, सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता, भुगतान में देरी और डिजिटल माध्यमों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जिला स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों के सामने सुरक्षा, कानूनी सहायता और पेशेवर सम्मान के प्रश्न भी हैं।

नई परिषद के सामने यह महत्वपूर्ण चुनौती होगी कि वह छोटे और क्षेत्रीय समाचार-पत्रों की समस्याओं को भी पर्याप्त महत्व दे। प्रेस की स्वतंत्रता का आकलन केवल बड़े मीडिया घरानों की स्थिति से नहीं, बल्कि उन पत्रकारों की परिस्थितियों से भी होना चाहिए, जो स्थानीय सत्ता और प्रशासन से कठिन सवाल पूछते हैं।

प्रेस की स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों जरूरी

भारतीय प्रेस परिषद प्रेस परिषद अधिनियम, 1978 के तहत गठित एक वैधानिक, स्वायत्त संस्था है। इसका उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखना तथा समाचार-पत्रों और समाचार एजेंसियों के मानकों को सुरक्षित रखना है। परिषद पत्रकारिता की नैतिकता से जुड़े मामलों और प्रेस संबंधी शिकायतों पर विचार कर सकती है।

हालांकि, इसकी भूमिका को समझना भी आवश्यक है। प्रेस परिषद प्रत्येक पत्रकार की नौकरी, वेतन, सरकारी विज्ञापन या सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली कार्यपालिका नहीं है। इसके अधिकार कानून से निर्धारित हैं और इसकी शक्तियां सीमित हैं। इसलिए पत्रकारों की हर समस्या का समाधान केवल परिषद से अपेक्षित नहीं किया जा सकता। फिर भी अपने अधिकार क्षेत्र में पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रभावी कार्रवाई के माध्यम से यह महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

मीडिया की स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं है। पत्रकारिता में तथ्यपरकता, निष्पक्षता, जनहित और जिम्मेदारी भी उतने ही आवश्यक हैं। लेकिन नैतिकता के नाम पर पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज को दबाने या आलोचनात्मक खबरों को हतोत्साहित करने की किसी भी प्रवृत्ति पर गंभीर विमर्श होना चाहिए।

नई परिषद के सामने पांच प्रमुख अपेक्षाएं

पहली, छोटे और मध्यम समाचार-पत्रों की आर्थिक एवं संस्थागत समस्याओं पर ठोस विमर्श हो।

दूसरी, पत्रकारों के विरुद्ध हिंसा, धमकी और प्रतिशोध की शिकायतों पर संबंधित सक्षम संस्थाओं के साथ समन्वय तथा कानून के दायरे में प्रभावी कार्रवाई की व्यवस्था मजबूत हो।

तीसरी, सरकारी विज्ञापन नीतियों में पारदर्शिता, स्पष्ट मानदंड और समय पर भुगतान जैसे मुद्दों पर संबंधित सरकारों तथा नियामक संस्थाओं का ध्यान आकर्षित किया जाए।

चौथी, हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों और दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत पत्रकारों की समस्याओं को परिषद की चर्चाओं में उचित स्थान मिले।

पांचवीं, प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की नैतिकता से जुड़े मामलों में निष्पक्षता, समयबद्धता तथा निर्णयों की सार्वजनिक उपलब्धता को प्राथमिकता दी जाए।

नियुक्तियों से आगे बढ़कर परिणाम दिखाने होंगे

13 पत्रकार सदस्यों की नियुक्ति परिषद को सक्रिय बनाने का अवसर है, लेकिन नियुक्तियां अपने आप में उपलब्धि का अंतिम प्रमाण नहीं हैं। परिषद की वास्तविक उपयोगिता इस बात से सामने आएगी कि वह पत्रकारिता से जुड़े सवालों पर कितनी गंभीरता से विचार करती है, शिकायतों का निपटारा किस तरह करती है और अपनी सिफारिशों के माध्यम से व्यवस्था में कितनी पारदर्शिता लाने में सफल होती है।

लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछना पत्रकारिता का दायित्व है। उसी तरह पत्रकारिता से जवाबदेही की अपेक्षा करना भी जनता का अधिकार है। इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और सक्रिय प्रेस परिषद आवश्यक है।

नई परिषद के सदस्यों के सामने अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। उन्हें यह साबित करना होगा कि प्रेस परिषद केवल नामित सदस्यों का संस्थागत मंच नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता, क्षेत्रीय मीडिया और जनहित में काम करने वाले समाचार-पत्रों की समस्याओं पर सुनवाई का प्रभावी माध्यम है।

क्योंकि लोकतंत्र में प्रेस की ताकत केवल बड़े संस्थानों की पहुंच से नहीं, बल्कि उस छोटे पत्रकार की निर्भीक कलम से भी तय होती है, जो अपने क्षेत्र में अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है।


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By udaen

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