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*बड़े किसानों का झुकाव केले की खेती की तरफ बढ़ता जा रहा है।*
खमरिया, ईसानगर व कटौली क्षेत्र में केले की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी जिले में गन्ने के कुल रकबे का आठ फीसदी ही है।

ईसानगर, धौरहरा व खमरिया गन्ने की खेती के लिए जाना जाता है। इन क्षेत्रों में किसान द्वारा हजारों हेक्टेयर गन्ने की खेती की जाती है, लेकिन गन्ने का वाजिब दाम न मिलने और चीनी मिल में भुगतान में देरी से बड़े किसान केले की खेती की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। क्योंकि केले की खेती में गन्ने की अपेक्षा ज्यादा मुनाफा है और फसल भी नगद ही खेत पर ही बिक जाती है। इसके अलावा इसमें गन्ने की तरह पर्ची मिलने से लेकर चीनी मिल तक गन्ने को ले जाने और फिर भुगतान के लिए एक-एक साल तक इंतजार करने की इसमें कोई समस्या नहीं है। क्षेत्र में सबसे अधिक केले की खेती ईसानगर खमरिया क्षेत्र में होती है यह इलाका केले की फसल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। यहां की बलुई दोमट मिट्टी और जलवायु केले की खेती के लिए काफी मुफीद है।

वे किसान जो पहले दो एकड़ में गन्ना लगाते थे अब वे एक एकड़ में गन्ना की खेती एवं एक एकड़ में केले की खेती कर रहे हैं। उनके अनुसार एक एकड़ केले की खेती में 30-40 हजार रुपये लागत आ रही है, जबकि एक एकड़ में 1500 पौधों से उन्हें 1.20 लाख की पैदावार हो जाती है। इस तरह किसानों को एक एकड़ में 80 हजार रुपये तक की बचत हो जाती है। वहीं, इस वक्त एक एकड़ गन्ने की खेती में 30 हजार रुपये की लागत आ रही है। यदि एक एकड़ में 300 ¨क्वटल गन्ना उपजाया जाये तो गन्ना किसान को इस वक्त के रेट से 84 हजार रुपये मिलेंगे और उसे करीब 54 हजार रुपये की ही आय होगी, वह भी तब जब उसे समय से गन्ने का दाम मिल जाए।

केला किसान को सबसे बड़ा फायदा यह है कि व्यापारी खेत पर ही उसकी उपज खरीद लेते हैं और तुरन्त भुगतान कर देते हैं। अच्छी आमदनी के चलते बहुत से लोग किराए पर खेत लेकर केले की खेती कर रहे हैं। गोरखपुर के केले के व्यापारी बताते हैं, ”
*हम लोग किसानों से खेत में ही केले का सौदा कर लेते हैं और उनको नकद भुगतान कर देते हैं।*
किसानों के अनुसार हमारे इलाके में राबेस्टा और जी-9 प्रजाति के केले की खेती अधिक हो रही है। इसके अलावा चीनिया, मालभोग, पूवान, अल्पना प्रजाति के भी केले की खेती होती है। सब्जी के लिए कोठिया, कैंपियरगंज, हाजरा, काबुली, बत्तीसा प्रजाति के केले की बोआई की जाती है। कुछ किसान केले के खेत में मूली, फूलगोभी, पालक, धनिया पत्ती, आलू, बाकला की केले के दो पौधों के बीच बोआई कर अतिरिक्त लाभ कर रहे हैं। कई किसान खुद अपनी नर्सरी भी तैयार की सोच रहे हैं। केले की खेती के लिए जरूरी है कि किसान के पास ¨सचाई के लिए उपयुक्त साधन हो क्योंकि गर्मी के महीने में खेत में नमी का रहना जरूरी होता है। साथ ही भरपूर मात्रा में गोबर की खाद की जरूरत होती है। किसान को प्रति एकड़ तीन ट्रॉली गोबर की खाद का व्यवस्था करनी होती है। जून का दूसरा सप्ताह पौध रोपण के लिए सबसे उत्तम होता है। टिश्यू कल्चर का प्रति पौधा 13 से 15 रुपया पड़ता है। नर्सरी कर पौधा तैयार करने में सिर्फ एक रुपया ही लागत आती है। पौधरोपण से लेकर फल और फूल बनने तक चार अवस्था होती है। पहले 30 दिन फसल स्थापना, 150 दिन वानस्पतिक अवस्था, 240 दिन बाद फल और फूल बनने की अवस्था 270 दिन बाद की मानी जाती है। किसान अपने प्रति पौधे को यूरिया 25 ग्राम, डीएपी 75 ग्राम लगाने के तीस दिन बाद, 150 के अंदर यूरिया 175 ग्राम, डीएपी 200 ग्राम, 150 के बाद 240 दिन के अंदर यूरिया व डीएपी 150 ग्राम के हिसाब से देना होता है। इसके अलावा दस बार पौधों को पानी देना होता है। राबेस्टा प्रजाति के केले की खेती में प्रति एकड़ 90 हजार की लागत आती है । जी-9 प्रजाति की लागत प्रति एकड़ एक लाख तीस हजार तक पहुंच जाती है। एक एकड़ में आठ बाई चार फुट की दूरी पर 1500 पौधे लग जाते हैं। राबेस्टा प्रजाति के केले के प्रति पौधे की उपज 20 से 25 किग्रा होती है तो जी-9 की 30 से 40 किग्रा होती है।

जिन के पास अपनी खेती नहीं है। उन्होंने 15 हजार प्रति एकड़ की दर से खेत किराए पर लिया और वर्ष में दो बीघा जमीन में केला की खेती की। दो-बीघे में कुल दो हजार केले के पौधे लगे, जिस पर 1.40 लाख रुपये लागत आई, जबकि उन्हें इससे आय 2.80 लाख की हुई। इसी महरिया, मूड़ी, रायपुर, बेल्तुआ, ईसानगर, कटौली, अवस्थीपुरवा, सिसैया आदि गांवों के किसान केले की खेती कर रहे हैं।


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By udaen

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