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भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मॉनसून का बड़ा महत्व है। देश में कुल 70% बारिश मॉनसून के दौरान ही होती है और चावल, गेहूं, गन्ना, तिलहन जैसे सोयाबीन का उत्पादन इसी बारिश पर निर्भर करता है। भारत की 2.5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी 15% है, लेकिन यह 1.3 अरब की कुल आबादी में से आधे को रोजगार प्रदान करती है।

हाइलाइट्स

  • देश की अर्थव्यवस्था की तरक्की के लिए मॉनसून का है बहुत बड़ा महत्व
  • हर साल मॉनसून के दौरान ही होती है देश की कुल 70 फीसदी बारिश
  • अर्थव्यवस्था में 15 फीसदी है कृषि की हिस्सेदारी और देती है भारी तादाद में रोजगार
  • मॉनसून का उपभोक्ता मांग, समस्त अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों पर व्यापक असर

मुंबई
भारतीय अर्थव्यवस्था में मॉनसून की बड़ी भूमिका है। शेयर बाजार से लेकर उद्योग जगत पर मॉनसून के पूर्वानुमान का बड़ा असर पड़ता है। अगर मौसम विभाग मॉनसून बढ़िया रहने की पूर्वानुमान जताता है तो शेयर बाजार और उद्योग जगत में उत्साह का माहौल होता है, जबकि अगर मॉनसून की बारिश कम रहने की संभावना है तो फिर अर्थव्यवस्था के सुस्ती की तरफ बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। आखिर अर्थव्यवस्था का मॉनसून से क्या लेना-देना है? आइए जानते हैं कि अर्थव्यवस्था और मॉनसून के बीच क्या संबंध है।

मॉनसून ने केरल में एक सप्ताह की देरी से दस्तक दिया है और यह सामान्य से धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। जून में अब तक मॉनसून की बारिश औसत से 44% कम हुई है, जिसके कारण गरमा फसलों की बुवाई में देरी हो रही है, इससे देश के कई हिस्सों में भीषण सूखे की संभावना बढ़ गई है। बारिश में इस कमी का उपभोक्ता मांग, समस्त अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों पर व्यापक असर पड़ सकता है।

भारत मौसम विभाग (आईएमडी) ने 2019 में औसत बारिश की संभावना जताई है, जबकि मौसम का पूर्वानुमान जताने वाली देश की एकमात्र निजी संस्था स्काईमेट ने सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई है।

कितने तरह के होते हैं मॉनसून?

आईएमडी जून से सितंबर के बीच चार महीने में 96% से 104% के बीच हुई बारिश को औसत या सामान्य मॉनसून के रूप में परिभाषित करता है। लंबी अवधि (50 साल) के लिए पूरे भारत में इस सीजन में होने वाली बारिश का औसत 89 सेंटीमीटर है।

औसत के 90% से कम बारिश वर्षाभाव या अनावृष्टि मानी जाती है, जो सूखे की स्थिति है। साल 2018 में भारत में सामान्य के मुकाबले नौ फीसदी कम बारिश हुई, जबकि कुछ इलाकों में यह कमी 37% तक रही। औसत से 110% अधिक बारिश को सामान्य से अधिक माना जाता है, जिसके कारण बाढ़ की स्थिति आती है और फसलों का उत्पादन घट जाता है। दक्षिण केरल तट में एक जून के आसपास बारिश के साथ ही मॉनसून सीजन की शुरुआत होती है और यह जुलाई के मध्य तक पूरे देश को कवर कर लेता है।

इस साल क्या है स्थिति?

इस साल केरल में मॉनसून एक जून के बजाय आठ जून को पहुंचा है। अरब सागर में चक्रवाती तूफान ‘वायु’ के उत्पन्न होने और मॉनसून से नमी को खींच लेने की वजह से इसकी प्रगति में बाधा पैदा हुई है। मॉनसून जून मध्य तक आधे भारत को कवर कर लेता है, लेकिन इस साल यह देश के एक चौथाई हिस्से को ही कवर कर सका है।

मॉनसून में देरी का मतलब कम बारिश?
कई उदाहरण हैं, जिनमें मॉनसून के देरी से आने या उसकी गति धीमी होने के बावजूद बारिश औसत या औसत से अधिक रही है। साल 2016 में केरल में मॉनसून आठ जून को पहुंचा, लेकिन 13 जुलाई तक इसने पूरे देश को कवर कर लिया और इस दौरान औसत बारिश हुई थी। कई बार जून में बारिश कम हुई है, लेकिन जुलाई में ज्यादा बरसकर उसने उस कमी को पूरा कर दिया।

देश में कुल 70% बारिश मॉनसून के दौरान ही होती है और चावल, गेहूं, गन्ना, तिलहन जैसे सोयाबीन का उत्पादन इसी बारिश पर निर्भर करता है। भारत की 2.5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी 15% है, लेकिन यह 1.3 अरब की कुल आबादी में से आधे को रोजगार प्रदान करती है।

मॉनसून बढ़िया रहने से कृषि उत्पादन बढ़ता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को बढ़ावा मिलता है। बेहतर मॉनसून के पूर्वानुमान से खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में उप्तादों की बिक्री करने वाली कंपनियों के शेयरों के भाव शेयर बाजार में ऊपर चढ़ते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए महत्वपूर्ण क्यों है मॉनसून?
पीएम मोदी ने अगले पांच वर्षों में किसानों की आय को दोगुनी करने और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का वादा किया है। उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करने वाली कंपनियों ने ग्रामीण मांग में सुस्ती का संकेत दिया है। जलाशयों के घटते जलस्तर के कारण चेन्नै, मुंबई और हैदाराबाद को जलापूर्ति में कटौती को मजबूर होना पड़ा है।

कीमतों और आरबीआई पॉलिसी को कैसे प्रभावित करता है मॉनसून?
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) नीतिगत ब्याज दर सहित मौद्रिक नीति पर फैसला लेते वक्त देश के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर गौर करता है। फसलों का बंपर उत्पादन खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखता है।

सरकार ने अतीत में सूखे के कारण किसानों को नकदी का भुगतान किया है, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ा है। अगर मॉनसून बढ़िया रहता है तो सरकार को इस तरह के खर्च से निजात मिलती है। सूखे की स्थिति में सब्जियों और दालों की कीमतों में इजाफा होगा, जिसके कारण कल्याणकारी योजनाओं पर अधिक खर्च करने की जरूरत होगी।

कितना विश्वसनीय होता है मौसम का पूर्वानुमान?
आईएमडी अपना पहला पूर्वानुमान अप्रैल के मध्य में जारी करता है। बीते दो दशक में इसका अनुमान हर पांच साल में एक बार ही सटीक हुआ है। 2008 के बाद साल 2017 में आईएमडी का पूर्वानुमान बिल्कुल सटीक था। साल 2018 में इसने 97% बारिश का पूर्वानुमान जताया था, लेकिन देश में केवल 91% बारिश हुई थी। यहां तक कि सामान्य मॉनसून के सालों में भी भारत के कुछ हिस्सों में बाढ़ तो कुछ हिस्सों को सूखे का सामना करना पड़ा था। आईएमडी मॉनसून का दूसरा पूर्वानुमान मई के अंतिम सप्ताह या जून के पहले सप्ताह में जारी करता है।


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By udaen

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