जब पहाड़ आबाद रहेगा तो ही उत्तराखण्ड फलेगा फूलेगा।

सांसद अनिल बलूनी ने कहा कि उन्होंने स्वयं अनुभव किया कि पलायन द्वारा शिक्षा, रोजगार तो प्राप्त कर सकते है, किंतु अपनी जड़ों से जुड़े रहने की कोशिश प्रत्येक प्रवासियों को करनी चाहिए ताकि हमारी भाषा और संस्कृति रीति रिवाज त्योहार संरक्षित रह सकें।

पहाड़ पुत्र बलूनी ने कहा कि गांव से जुड़कर ही व्यवहारिक रूप से हम परिस्थितियों को समझ सकते हैं। उन्होंने कहा कि पलायन पर कार्य करने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों से जुड़कर वे इस अभियान को आगे बढाएंगे।

सांसद अनिल बलूनी ने कहा कि उन्होंने निर्जन बौरगांव को गोद लेकर अनुभव किया है कि बहुत समृद्ध विरासत की हम लोगों ने उपेक्षा की है। हमने पलायन को विकास का पर्याय मान लिया है। अगर हर प्रवासी अपने गांव के विकास की चिंता करें और गांव तथा सरकार के बीच सेतु का कार्य करें तो निसंदेह हम अपनी देवभूमि को भी सवार पाएंगे और अपनी भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों को सहेज पाएंगे।
ये सोच और किसी की नही आपके अनिल बलूनी की है और इसी सोच और निष्ठा से बतौर सांसद कार्य करने वाले पहाड़ पुत्र अनिल बलूनी की बढ़ती लोकप्रियता से उनके राजनीतिक विरोधियों के पसीने छूटने लगे है। जरा सोचिए जब एक नेता सांसद , विधायक, मंत्री , ओर सरकार मै महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने गाँव जाकर लोकतंत्र के महापर्व मैं अपना अनमोल वोट देगा।
तो गाँव की जनता से भी मिलेगा उनके दुःख दर्द को समझेगा ओर उनके लिए सक्षम नेता उनके दुख को दूर करने का वादा भी करेगा ।ओर गाँव तक बेसिक सुविधाओं को पहुचायेगा भी ।
क्योंकि जब जब वोट डालने नेता गाँव पहुचेगा तो जनता बता देगी की अपने क्या कहा था और क्या हुआ क्या नही। इसलिए जो नेता गाँव के लिए काम करेगा वो उनके लिए लोकप्रिय होगा । ओर जो सिर्फ कहेगा करेगा कुछ नही उसको जनता खदेड़ देगी गाँव से वोट भी नही डालने देगी।
अब आप समझे ना कि कहने मै सिर्फ छोटी बात लग रही हो कि मेरा वोट डालने वाला पता मेरे गाँव का कर दो साहब । पर इसके मायने बहुत बडे है ओर उसे वही समझेगा जो पहाड़ के दर्द को दूर करने की कोशिश करता है।जिसके सीने मै पहाड़ का दर्द हो।
बहराल पहाड़ पुत्र अनिल बलूनी ने उत्तराखंड के उन सब नेताओ को आइना दिखा दिया है जो टीवी चैनल से लेकर राजधानी मै पलायन की बात करते है पर करते कुछ नही।
हम तो कहते है कि बलूनी जी ने रास्ता दिखाया या कह लो आइना
अगर सब वे नेता जो पहाड़ के रहने वाले है।वे सभी पहाड़ के अधिकारी , अपने गाँव को ही अपना स्थाई पता लिखवाए।
ओर वोटर लिस्ट मे नाम भी वही का ।
तो साहब उम्मीद है हमको जब नेता, अधिकारी खुद गाँव गाँव के दर्द को देखोगे तो उनके लिए गाँव के विकास के लिए जरूर कुछ करेगे । ओर ये उत्तराखंड गाँव मै ही बसता है पहाड़ मै ही बसता है ।जब पहाड़ आबाद रहेगा तो ही उत्तराखण्ड फलेगा फूलेगा।

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