उत्तराखंड मानव अधिकार ने मुख्यमंत्राी से किया आग्रह , लालढांग-चिल्लरखाल मार्ग के निर्माण कार्य को पीडब्ल्यूडी के आदेश से नहीं बल्कि प्रभागीय वन अधिकारी के आदेश से रोका गया है। इस मामले का संज्ञान लेते हुए मानव अधिकार संरक्षण केंद्र ने इस विषय में गहन से जांच-पड़ताल की और पाया कि लालढांग-चिल्लरखाल मार्ग के निर्माण कार्य को पीडब्ल्यूडी के आदेश से नहीं बल्कि प्रभागीय वन अधिकारी के आदेश से रोका गया है। निर्माण कार्य रोकने के लिए लैंसडोन वनप्रभाग के डीएफओ ने भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा-38(0)(2) के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए 8 मार्च को इस सड़क का निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव रोकने के लिए अधिशासी अभियंता, निर्माणखंड लोनिवि, दुगड्डा-गढ़वाल को आदेश जारी किए थे। 14 मार्च को इंडियन एक्सप्रैस में छपी एक खबर का संज्ञान लेते हुए महानिरिक्षक, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक का जवाब-तलब किया था। उसी अनुक्रम डीएफओ, लैंसडाउन ने 05 अप्रैल को वन संरक्षक, शिवालिक वृत्त को लिखे अपने पत्र में स्वीकार किया गया वन भूमि को पीडब्ल्यूडी को हस्तानांतरति करने से पूर्व राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद/राष्ट्रीय वन्य जीव सलाहकार परिषद की जरूरी सहमति/ अनापत्ति प्राप्त नहीं की गई हैं। इसी पत्र को डीएफओ ने अधिशासी अभियंता, लोनिवि को संदर्भित करते हुए पुनः निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव से रोकने के आदेश दिए। इसी अनुक्रम में उत्तराखंड शासन ने शासनादेश संख्या 190-III(2)19-12(प्रा0आ0)/2016 दिनांक 30 अप्रैल के द्वारा प्रमुख अभियंता, पीडब्ल्यूडी को आदेश किए कि मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक, उत्तराखंड ने लैंसडाउन वनप्रभाग के समस्त वन क्षेत्राधिकारी को अपने क्षेत्रांतर्गत वनभूमि हस्तानांतरण से संबंधित समस्त प्रकरणों पर तत्काल प्रभाव रोक देने की अपेक्षा की गई है अतः लालढांग-चिल्लरखाल सड़क निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव से रोकने का आदेश सभी अभियंताओं को जारी करें। 03 मई, 2019 को एनजीटी ने इस निर्माण के संदर्भ में दायर एक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए पारित अपने आदेश में कहा कि उपरोक्त सड़क के निर्माण के लिए संवैधानिक स्वीकृतियां प्राप्त नहीं की गई है। एनजीटी ने उपरोक्त मामले पर संवैधानिक व्यवस्थाओं की अवहेलना करने पर एक जांच कमेटी का गठन किया है और तीन महीने में जांच रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया। यह जांच कमेटी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की दिशा-निर्देश में जांच करेगा की इस मामले में किस स्तर से चूक हुई।इन सभी कार्यवाहियों से अवगतवन मंत्री हरक सिंह रावत द्वारा अपरमुख्य सचिव, पीडब्ल्यूडी को लिखित में निर्देश प्रदान किए गए कि वह डीएफओ के आदेश को निरस्त करते हुए तत्काल निर्माण कार्य शुरू कराएं। निर्माण कार्य शुरू नहीं कराए जाने पर माननीय मंत्राी जी ने पीडब्ल्यूडी के अभियंताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात कही है। वन वन विभाग के मुखिया हैं, वह अपने विभागीय अधिकारों का प्रयोग न करते हुए पीडब्ल्यूडी विभाग, जो मुख्यमंत्री का विभाग है, को आदेश कर रहे है कि वह वन विभाग के आदेश को निरस्त कर दें। उनका यह व्यक्तव्य और लिखित निर्देश सरासर गैर-कानूनी है। वन मंत्री इस मामले को सुलझाने की बजाए उलझा रहे है और अधिकारियों को परेशान कर रहे हैं, उनपर एनजीटी न्यायालय के आदेशों की अवहेलना का अनुचित दबाव बना रहे हैं। जबकि वन मंत्री को स्वयं इस बात की जांच करनी चाहिए कि वन भूमि के हस्तानांतरण में कहां चूक हुई, उन्हें उन खामियों को दूर करना चाहिए। मानव अधिकार संरक्षण केंद्र की 6 म्युनिसिपल रोड, डालनवाला में हुई बैठक में उत्तराखंड शासन एवं पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों और अभियंताओं को इस तरह से परेशान करने, धमकी देने और माननीय न्यायालय की अवमानना के लिए अनुचित दबाव बनाने की घोर निंदा की गई और माननीय मुख्यमंत्राी जी से आग्रह किया गया है कि वह इस मामले में दखल दे और लैंसडाउन में कार्यरत और शासन में कार्यरत् अधिकारियों को इस मामले में उनके मानव अधिकारों का संरक्षण करें ताकि वह निष्पक्षता एवं निर्भीकता के साथ राज्य के विकास में अपना योगदान दे सकें। बैठक में केंद्र के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (रि) केडी शाही, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ सुनील अग्रवाल, उपाध्यक्ष श्रीनिवास, महासचिव कुँवर राज अस्थाना, सचिव एमसी उप्रेती (रि. आईएएस), सचिव राजीव वर्मा, राजा डोगरा, आरके साधु, वासु, एमके सिंह, डॉ. आरके चमोली आदि उपस्थित थे।

इस मामले का संज्ञान लेते हुए मानव अधिकार संरक्षण केंद्र ने इस विषय में गहन से जांच-पड़ताल की और पाया कि लालढांग-चिल्लरखाल मार्ग के निर्माण कार्य को पीडब्ल्यूडी के आदेश से नहीं बल्कि प्रभागीय वन अधिकारी के आदेश से रोका गया है। निर्माण कार्य रोकने के लिए लैंसडोन वनप्रभाग के डीएफओ ने भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा-38(0)(2) के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए 8 मार्च को इस सड़क का निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव रोकने के लिए अधिशासी अभियंता, निर्माणखंड लोनिवि, दुगड्डा-गढ़वाल को आदेश जारी किए थे। 14 मार्च को इंडियन एक्सप्रैस में छपी एक खबर का संज्ञान लेते हुए महानिरिक्षक, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक का जवाब-तलब किया था। उसी अनुक्रम डीएफओ, लैंसडाउन ने 05 अप्रैल को वन संरक्षक, शिवालिक वृत्त को लिखे अपने पत्र में स्वीकार किया गया वन भूमि को पीडब्ल्यूडी को हस्तानांतरति करने से पूर्व राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद/राष्ट्रीय वन्य जीव सलाहकार परिषद की जरूरी सहमति/ अनापत्ति प्राप्त नहीं की गई हैं। इसी पत्र को डीएफओ ने अधिशासी अभियंता, लोनिवि को संदर्भित करते हुए पुनः निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव से रोकने के आदेश दिए। इसी अनुक्रम में उत्तराखंड शासन ने शासनादेश संख्या 190-III(2)19-12(प्रा0आ0)/2016 दिनांक 30 अप्रैल के द्वारा प्रमुख अभियंता, पीडब्ल्यूडी को आदेश किए कि मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक, उत्तराखंड ने लैंसडाउन वनप्रभाग के समस्त वन क्षेत्राधिकारी को अपने क्षेत्रांतर्गत वनभूमि हस्तानांतरण से संबंधित समस्त प्रकरणों पर तत्काल प्रभाव रोक देने की अपेक्षा की गई है अतः लालढांग-चिल्लरखाल सड़क निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव से रोकने का आदेश सभी अभियंताओं को जारी करें। 03 मई, 2019 को एनजीटी ने इस निर्माण के संदर्भ में दायर एक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए पारित अपने आदेश में कहा कि उपरोक्त सड़क के निर्माण के लिए संवैधानिक स्वीकृतियां प्राप्त नहीं की गई है। एनजीटी ने उपरोक्त मामले पर संवैधानिक व्यवस्थाओं की अवहेलना करने पर एक जांच कमेटी का गठन किया है और तीन महीने में जांच रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया। यह जांच कमेटी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की दिशा-निर्देश में जांच करेगा की इस मामले में किस स्तर से चूक हुई।इन सभी कार्यवाहियों से अवगतवन मंत्री हरक सिंह रावत द्वारा अपरमुख्य सचिव, पीडब्ल्यूडी को लिखित में निर्देश प्रदान किए गए कि वह डीएफओ के आदेश को निरस्त करते हुए तत्काल निर्माण कार्य शुरू कराएं। निर्माण कार्य शुरू नहीं कराए जाने पर माननीय मंत्राी जी ने पीडब्ल्यूडी के अभियंताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात कही है। वन वन विभाग के मुखिया हैं, वह अपने विभागीय अधिकारों का प्रयोग न करते हुए पीडब्ल्यूडी विभाग, जो मुख्यमंत्री का विभाग है, को आदेश कर रहे है कि वह वन विभाग के आदेश को निरस्त कर दें। उनका यह व्यक्तव्य और लिखित निर्देश सरासर गैर-कानूनी है। वन मंत्री इस मामले को सुलझाने की बजाए उलझा रहे है और अधिकारियों को परेशान कर रहे हैं, उनपर एनजीटी न्यायालय के आदेशों की अवहेलना का अनुचित दबाव बना रहे हैं। जबकि वन मंत्री को स्वयं इस बात की जांच करनी चाहिए कि वन भूमि के हस्तानांतरण में कहां चूक हुई, उन्हें उन खामियों को दूर करना चाहिए।
मानव अधिकार संरक्षण केंद्र की 6 म्युनिसिपल रोड, डालनवाला में हुई बैठक में उत्तराखंड शासन एवं पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों और अभियंताओं को इस तरह से परेशान करने, धमकी देने और माननीय न्यायालय की अवमानना के लिए अनुचित दबाव बनाने की घोर निंदा की गई और माननीय मुख्यमंत्राी जी से आग्रह किया गया है कि वह इस मामले में दखल दे और लैंसडाउन में कार्यरत और शासन में कार्यरत् अधिकारियों को इस मामले में उनके मानव अधिकारों का संरक्षण करें ताकि वह निष्पक्षता एवं निर्भीकता के साथ राज्य के विकास में अपना योगदान दे सकें।
बैठक में केंद्र के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (रि) केडी शाही, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ सुनील अग्रवाल, उपाध्यक्ष श्रीनिवास, महासचिव कुँवर राज अस्थाना, सचिव एमसी उप्रेती (रि. आईएएस), सचिव राजीव वर्मा, राजा डोगरा, आरके साधु, वासु, एमके सिंह, डॉ. आरके चमोली आदि उपस्थित थे।

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