उत्तराखंड की स्थायी राजधानी एक अनसुलझा सवाल

राज्य किशोर से जवान हो गया, लेकिन राजधानी का मसला सियासी दांवपेचों में इस कदर उलझा कि इस पर पांच-पांच सरकारें कोई फैसला नहीं ले पाईं।
उत्तराखंड की जनता अब तक चार विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव देख चुकी हैलेकिन स्थायी राजधानी के सवाल पर इस वक्फे में केंद्र और राज्य में सत्ता में रही भाजपा व कांग्रेस, दोनों का रवैया एक जैसा टालमटोल वाला ही रहा है।हर चुनाव में स्थायी राजधानी का सवाल मुद्दा जरूर बनता है, मगर केवल सियासत के लिए। अलग राज्य बनने से पहले ही गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग उठी तो राज्य बनने के बाद पूरी सियासत भी इसी के इर्द-गिर्द घूमती रही। स्थायी राजधानी चयन के लिए आयोग बना। इसे 11 बार एक्सटेंशन दिया गया, 10 साल पहले रिपोर्ट विधानसभा को सौंप दी गई, लेकिन नतीजा फिर भी सिफर
क्या इस चुनाव में पहाड में रहने वाले जागरूक मतदाता आने वाले प्रत्याक्षी से पूछ पाएंगे की पहाड़ के विकास के लिए अलग राज्य बना तो फिर पहाड़ की राजधानी पहाड़ में क्यूँ नहीं क्या राजधानी का बार बार टला जाना पहाड़ की जनभावना का अपमान नहीं क्या हमारा जागरूक मीडिया समय समय पे इन सवालों को उठाकर जनता की आवाज बनेगा या व्यवसायिकारण के इस दौर में ये सिर्फ चुनवी मुदा रहेगा .

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