इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को दिलाया याद, संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं रहने के बावजूद अभी भी संवैधानिक अधिकार है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की इस बात के लिए आलोचना की है कि वह बिना किसी अधिग्रहण के और मुआवज़ा चुकाए लोगों की निजी ज़मीन ले रही है।

न्यायमूर्ति शशि कांत गुप्ता और न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ ने सरकार को याद दिलाया कि संपत्ति का अधिकार भले ही मौलिक अधिकार न रहा हो पर वह अभी भी संवैधानिक और मानवाधिकार है।

कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव से कहा है वे उन सभी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें जो लोगों कि निजी ज़मीन बिना किसी उचित क़ानूनी प्रक्रिया के हथिया रहे हैं।

“हमें यह बाध्य होकर इस बात पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करनी पड़ रही है कि लोगों की निजी ज़मीन बिना किसी अधिग्रहण के या उनको इसके लिए कोई मुआवज़ा चुकाए ही उनसे ली जा रही है। इस तरह की परिपाटी उचित नहीं है और इसकी कड़े शब्दों में नींदा की जानी चाहिए। राज्य के अधिकारी सड़कों को चौड़ा करने के लिए निजी ज़मीन को बिना किसी अधिग्रहण और बिना इसके लिए कोई उचित मुआवज़ा चुकाए अपने क़ब्ज़े में ले रहे हैं।

“ज़मीन का क़ब्ज़ा लेने से पहले संबंधित प्रावधानों के तहत अधिकारियों को इसके बदले मुआवज़ा चुकाना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में राज्य उचित मुआवज़ा अधिकार अधिनियम या किसी अन्य क़ानून का उल्लंघन कर न तो ज़मीन अधग्रहीत करेगा और न ही उसका क़ब्ज़ा अपने हाथ में ले सकता है। अधिकारियों का यह कार्य संविधान के अनुच्छेद 14 और 300A का उल्लंघन है। अनुच्छेद 300A के तहत किसी भी व्यक्ति को क़ानूनी अथॉरिटी के अलावा कोई उसके ज़मीन से वंचित नहीं कर सकता,” कोर्ट ने कहा।

“अनुच्छेद 300A में कहा गया है कि सिर्फ़ किसी कार्यपालक आदेश, जिसके पीछे विधायिका द्वारा बनाए गए किसी क़ानून का कोई अथॉरिटी नहीं है, के द्वारा किसी व्यक्ति को उसकी परिसंपत्ति से बेदख़ल नहीं किया जा सकता। यद्यपि संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं रहा पर यह अभी भी एक संवैधानिक अधिकार है,” कोर्ट ने कहा।

पीठ ने यह गायित्री देवी और दो अन्य लोगों की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। इन लोगों ने दावा किया था कि सरकार ने शीतलपुर गाँव (टिकरी) से गोरापुर (बक्सेडा) सिकंदरा तक लिंक रोड बनाने के उनकी ज़मीन उनसे ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से ले ली है।

सरकार के वक़ील ने इस बात को माना कि याचिकाकर्ताओं को उनकी ज़मीन लिए जाने के बदले कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया है।

अदालत का ध्यान 12.5.2016 को सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना की ओर खींचा गया जिसमें कहा गया है कि जब कोई ज़मीन अधिग्रहीत की बात आती है तो इस पर एक समिति ग़ौर करती है जो दो महीने के भीतर यह रिपोर्ट ज़िला मजिस्ट्रेट को देती है ताकि उस पर उचित कार्रवाई की जा सके। पीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे इस समिति को एक प्रतिवेदन दें।

इसके बाद कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि बिना मुआवज़ा चुकाए और किसी क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना लोगों की ज़मीन लेने वाले अधिकारियों के ख़िलाफ़ वे कार्रवाई सुनिश्चित करें।

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