आत्म-मुग्धता की शिकार युवा पीढ़ी आत्म-मुग्धता की शिकार युवा पीढ़ी

वैश्विकरण, बाजार आधारित व्यवस्था तथा बढ़ते धन के केन्द्रीकरण के कारण कठिन प्रतिर्स्पधा के इस दौर में युवा पीढ़ी आत्म-मुग्धता की शिकार हो रही है। बढ़ते वैश्विकरण तथा आधुनिक तकनीकी ज्ञान ने जीवन जीने की आसान राह को भले ही भौतिक सुविधाओं से सराबोर कर दिया हो परन्तु आज का असन्तुष्ट मानव जीवन की वास्तविकताओं से भटक कर सबसे कठिन दौर में पहुंच गया है। निजी स्वार्थों से आत्मलिप्त आज की युवा पीढ़ी नितान्त व्यक्तिवादी हो चुकी है। भूमंडलीकरण ने उन्माद, संकुचित मानसिकता तथा उन्मुक्तता को जन्म दिया है। इसी कारण व्यक्ति के अन्दर आत्म-मुग्धता, आत्म-हनन तथा आत्म-व्यस्थता के भाव जाग्रत हुए हैं। इन भावों के कारण आज का मानव स्वयं में स्वयं से ही उलझ कर रह गया है। इसका सबसे अधिक असर युवा पीढ़ी पर देखा जा सकता है। खासतौर पर सन् 1990 के बाद पैदा हुई पीढ़ी पर यह प्रमुख रूप से देखा जा सकता है। आत्म-मुग्धता ने युवा पीढ़ी को ना सिर्फ सामाजिक सरोकारों से काटा है बल्कि पारिवारिक जिम्मेदारियों से भी दूर करने का कार्य किया है। पहले यह प्रवृत्ति एक खास वर्ग में सीमित दायरे तक पायी जाती थी परन्तु भौतिकवादी युग में बढ़ते व्यक्तिवाद ने यह प्रवृत्ति हर वर्ग तक पंहुचा दी है। आज का युवा सिर्फ अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाने तक सीमित हो चुका है। स्वयं से स्वयं में ही उलझा आज का युवा जीवन दर्शन के प्रति दिग्भ्रमित है। आत्म-मुग्धता की शिकार युवा पीढ़ी आत्मदर्शन से वंछित हो चुकी है, स्व की पहचान न होने के कारण अधिकांश युवाओं का समाज के साथ तारतम्यता नहीं बैठ पा रहा है। जिसके कारण वे स्वयं को अकेला महसूस कर रहे हैं। जब तक स्व की पहचान नहीं होती तब तक वह अन्यों की पहचान करने में भी असमर्थ रहता है। ऐसा युवा अन्तर्द्वन्द से घिरा रहता है। फलतः वह स्वार्थपूर्ति में इतना व्यस्थ रहने लगता है कि उसे सारे सामाजिक सरोकार व्यर्थ लगने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति जरूरतबन्दों की मदद करने में भी कतराते हैं। आत्म-मुग्धता का शिकार व्यक्ति निजी जीवन में इतना व्यस्थ रहने लगता है कि, उसे अपने अलावा किसी दूसरे में कोई दिलचस्पी नहीं रह जाती है। आत्म विकृत यह समस्या पहले सिर्फ विकसित देशों में पायी जाती थी परन्तु अब यह भारतवर्ष में भी तेजी से पांव पसार रही है। यह भी चिन्तनीय है कि यह समस्या सबल और निर्बल आय वर्ग में समान रूप से तेजी से फैल रही है। भूमंडलीकरण के इस युग में मानवीय मूल्यों का तेजी से ह्रास हुआ है। जिस विद्या को ग्रहण करने के लिए पूरे विश्वभर से लोग विद्याध्ययन हेतु भारत में आते थे आज वही विद्या विलुप्ति के कगार पर है। आय के स्रोतों को बढ़ाने के लिए तथा पृथ्वी के सन्साधनों का दोहन करने के लिए भले ही शिक्षा का प्रसार तेजी से हुआ हो परन्तु मानवीय मूल्यों को संरक्षित एंव सवंर्द्वित करने वाली विद्या का तेजी से ह्रास हुआ है। बाजार आधारित व्यवस्था ने व्यक्ति को बाजारू बना दिया है। उसका हर कार्य व्यवसायिक रूप ले चुका है जिसका वह बाजार से मोल चहाता है। मोल लेने और मोल देने की इसी आपाधापी में आज का युवा सामाजिक सरोकारों से अलग-थलग हो चुका है। भारतीय दर्शन में सदैव मानवीय मूल्यों को सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया गया है जो कि विद्या के रूप में सम्पूर्ण विश्व में सदियों से प्रचारित-प्रसारित होती रही है। इसी ज्ञानार्जन के लिए कभी विश्व का मानव भारत आता था परन्तु आज भूमंडलीकरण का दानव उसे निगल लेना चहाता है। आज उस ज्ञान के संरक्षण एंव संवर्द्वन के साथ ही अगली पीढ़ी से आत्मसात् कराने की आवश्यकता है। ताकि भारत का वैभव पुनः लौट सके तथा भारत एक बार फिर से विश्व गुरू की पदवी पर विराजमान हो सके।

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