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नई दिल्ली [न्यूयार्क टाइम्स]। विश्व की जनसंख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है मगर उस हिसाब से हमारे पास संसाधनों की कमी होती जा रही है। पानी के गिरते स्तर को लेकर तो अभी से चिंता की जा रही है मगर आने वाले समय में हमारे पास खाने के संसाधन भी कम हो जाएंगे, इस ओर गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा है। कुछ देशों के वैज्ञानिकों ने इस ओर भी सोचना शुरू कर दिया है और वो इस पर रिसर्च कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तरह से आबादी का घनत्व बढ़ रहा है उस हिसाब से अगले कुछ सालों में हमारे पास खाने के संसाधन कम हो जाएंगे। खेती करने योग्य जमीन भी कम हो रही है। इस वजह से अब वैज्ञानिक जल्द उगने, पकने और बढ़ने वाले पेड़ पौधों और फलों की खोज कर रहे है जिससे उस समय की जरूरतों को पूरा किया जा सके।

ऑस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में एक प्लांट आनुवंशिकीविद् ली हिक्की का कहना है कि दुनिया की आबादी तेजी से बढ़ रही है, इस हिसाब से हमें कुछ सालों के बाद ही कभी अधिक भोजन की आवश्यकता होगी लेकिन खेती योग्य भूमि की मात्रा सीमित है। ग्लोबल वर्मिंग की वजह से अब गर्मी अधिक हो रही है मगर ठंडक और अन्य मौसमों पर काफी फर्क पड़ चुका है। ऐसे में आने वाले समय में हमारे सामने लोगों के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती होगी। उनका कहना है कि यदि आंकड़ों को देखें, तो हमारे पास 2050 तक ग्रह पर लगभग 10 बिलियन लोग हो जाएंगे, हमें हर किसी को खिलाने के लिए 60 से 80 प्रतिशत अधिक भोजन की आवश्यकता पड़ेगी। अब एक बड़ा सवाल ये भी सामने आ रहा है कि जिस तरह से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। उससे हमारे खेतों में पैदा होने वाली काफी फसलें भी प्रभावित हो रही है। उत्पादन में कमी हो रही है। यदि आने वाले समय में आबादी के प्रत्येक हिस्से को खाने के लिए भोजन मुहैया कराना है तो उसके लिए अभी से सोचना होगा।

उनका कहना है कि अभी तक जिस तरह से खेतों में फसलें उगाई जा रही है उसमें लंबा समय लगता है, हमें वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग करते हुए इन तरीकों में बदलाव करना होगा जिससे अधिक से अधिक फसल का उत्पादन किया जा सके। यदि हमने अभी से इस दिशा में सोचना शुरू नहीं किया तो किसी भी सूरत में हम भूखे लोगों को अनाज उपलब्ध नहीं करा पाएंगे। उनका कहना है कि अब हमें कुछ वैज्ञानिक तरीके ऐसे विकसित करने होंगे जिससे फसलों और पेड़ों में लगने वाला समय कम हो सके। इसके लिए हमें स्पीड ब्रीडिंग तकनीक के बारे में भी सोचना होगा। उन्होंने बताया कि पौधों की वृद्धि को तेज करने और उसमें रोगों की प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करने के लिए शोध किया जा रहा है।

हिक्की ने बताया कि इन दिनों उनकी टीम “स्पीड ब्रीडिंग” पर काम कर रही है, पौधों की वृद्धि को तेज करने के लिए प्रकाश और तापमान पर खास ध्यान दिया जा रहा है। यह शोधकर्ताओं को बीज काटने और अगली पीढ़ी की फसलों को जल्द उगाने में सक्षम बनाता है। उनकी तकनीक नासा के शोध से प्रेरित थी। अंतरिक्ष स्टेशनों पर भोजन कैसे विकसित किया जाए। वे दिन में 22 घंटे के लिए नीली और लाल एलईडी लाइट्स को नष्ट करके और 62 और 72 डिग्री फ़ारेनहाइट के बीच तापमान को ध्यान में रखते हुए फूलों की शुरुआत करते हैं। पिछले नवंबर में, नेचर के एक पेपर में, उन्होंने दिखाया कि वे एक साल में छह पीढ़ियों तक गेहूं, जौ, छोले और कैनोला तक उगा सकते हैं, यदि परंपरागत तरीके से इन फलों को उगाया जाए तो ये सिर्फ केवल एक या दो उपज ही दे पाएंगे।

नेचर बायोटेक्नोलॉजी में हिक्की और उनकी टीम ने स्पीड ब्रीडिंग की क्षमता के साथ-साथ अन्य तकनीकों पर प्रकाश डाला, जो सुरक्षा को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, नई तकनीकों जैसे जीन एडिटिंग के साथ अत्याधुनिक तकनीकों के साथ स्पीड ब्रीडिंग को जोड़ना सबसे अच्छा तरीका है। उनका कहना है कि हम वास्तव में यहां जो बात कर रहे हैं वह बड़े पैमाने पर प्लांट फैक्ट्रियां बना रही है। प्लांट रिसर्च में एक नया युग आया है। डेविस, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में प्लांट ब्रीडिंग सेंटर के निदेशक चार्ली ब्रुमर कहते हैं कि ब्रीडर्स और ब्रीडिंग कंपनियों ने हमेशा फसलों की एक नई किस्म विकसित करने में लगने वाले समय को कम से कम करने की कोशिश की है लेकिन स्पीड ब्रीडिंग जैसी नई तकनीकों के साथ हम इसे पहले की तुलना में अब बेहतर कर सकते हैं।

वनस्पतिविदों ने 150 साल पहले कृत्रिम प्रकाश – कार्बन आर्क लैंप के तहत पौधों को उगाना शुरू किया। तब से, एलईडी तकनीक में प्रगति ने काफी हद तक सटीकता में सुधार किया है जिसके साथ वैज्ञानिक व्यक्तिगत फसल प्रजातियों में प्रकाश सेटिंग्स को समायोजित और अनुकूलित कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने फूलों के समय का अनुकूलन करने और पौधों को वार्मिंग ग्रह की कठोरता के लिए अधिक प्रतिरोधी बनाने के लिए नई आनुवंशिक तकनीकों को भी अपनाया है। पुराने क्रॉसब्रेजिंग और क्रॉप मॉडिफिकेशन तकनीकों के विपरीत, क्रिस्प जैसे नए उपकरण वैज्ञानिकों को पौधे के अपने डीएनए के कुछ हिस्सों को बाहर निकालने की अनुमति देते हैं। डॉ.हिक्की और उनकी टीम पौधों की जीन को संशोधित करने के लिए क्रिस्प मशीनरी को सीधे पौधे में जोड़ने पर काम कर रही है। आलू और इस तरह की कुछ अन्य फसलों को इस तरह से उगाना आसान होगा। जो फसल की उपज को कम करता है। जर्मनी के डसेलडोर्फ के हेनरिक हेन विश्वविद्यालय में प्लांट जेनेटिस्ट बेंजामिन स्टिच ने कहा कि स्पीड ब्रीडिंग और जेनेटिक एडिटिंग एक निश्चित सीमा तक ही तेजी से प्रचार प्रसार कर सकते हैं।

डॉ. स्टिच और उनकी टीम ऐसे सभी लक्षणों के साथ पहचान को तेजी से ट्रैक करने के लिए जीनोमिक भविष्यवाणी नामक तकनीक विकसित कर रही है। सबसे पहले, शोधकर्ता लेते हैं कि वे क्या जानते हैं कि विभिन्न जीन विकास और उपज को कैसे प्रभावित करते हैं। फिर, वे उस डेटा को कंप्यूटर मॉडल में इनपुट करते हैं और भविष्यवाणियां निकालते हैं कि किस पौधे में जीन और उपज का सबसे अच्छा संयोजन होगा।

हिक्की की टीम ने अगले कुछ सालों में भारत में जिम्बाब्वे और माली में ऐसे प्लांट लगाने वालों को प्रशिक्षित करने की योजना बना रहा है जिससे वो अभी से इस पर काम शुरू कर सकें। दरअसल भारत में अलग-अलग शहरों में मौसम भी अलग होता है इस वजह से यहां पर इस तरह की ज्यादा संभावनाएं है। इसके लिेए अंतर्राष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान और बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन से अनुदान के साथ बातचीत चल रही है। हिक्की ने कहा कि यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि यह विकासशील देशों के किसानों को भी लाभ पहुंचाएं। उनका कहना है कि जिन देशों में और जिन जगहों पर बिजली और अन्य संसाधनों की कमी है वहां पर सौर पैनलों का उपयोग करके फल और अन्य चीजें उगाई जा सकती है। इसी के साथ उनका कहना है कि केवल इसी तकनीकी से हम भविष्य की सभी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते हैं इसके लिए अन्य संसाधनों की भी जरूरत पड़ेगी और उसके लिए हमें अभी से सोचना होगा।


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By udaen

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